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Thursday, March 11, 2021

कागज कलम और एक शांत कोना...



धरती नाप ली नापने को,
अंतरिक्ष में आसमान बहुत हैं।
“पंख” थोड़े कमजोर पड़ गए,
हौसलों में अब भी उड़ान बहुत हैं।

चापलूसी से जीतेंगे जग को,
सोचने वाले नादान बहुत हैं।
खुद को अमर समझने वाले,
भूल गए कि श्मशान बहुत हैं।

मन, वचन और कर्म से ऊँचे,
दुनिया में अब भी इंसान बहुत हैं।
सब कुछ बख्शा है खुदा ने,
फिर भी बन्दे हैरान बहुत हैं।

लाखों की माया है फिर भी,
दिल में दबे अरमान बहुत हैं।
पत्थर को दर्जा दिया खुदा का,
खुले घूमते शैतान बहुत हैं।

कागज़, कलम और शांत-सा कोना,
लिखने को पूरा जहान बहुत है।
दुआएँ अपनों की रहती हैं संग,
फिर भी “हैरी” परेशान बहुत है।