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Thursday, July 16, 2026

बदली हुयी नस्लें...


 तुम्हारी हर तरक़्क़ी का वो जो आधार बैठे हैं,

तुम्हें अफ़सर बनाकर खुद तो बे-रोज़गार बैठे हैं।

तुम्हारी डिग्रियों ने बस तुम्हें ये अक़्ल बख़्शी है,

कि तुम ये सोच सको कि बूढ़े अब बेकार बैठे हैं।


तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,

कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?

जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,

तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।


कहाँ फुर्सत है तुमको जो बैठो दो घड़ी उनके पास,

तुम्हारी मोबाइल स्क्रीन पर ही तो बसती है दुनिया ख़ास।

वो ज़िंदा लाश बनकर घर के कोने में पड़े हैं,

तुम्हें शायद उन्हें खोने का बिल्कुल भी नहीं 'एहसास'।


वसीयत लिखवाते ही जो रंगत बदल जाती है तुम्हारी,

अचानक लगने लगती है बुज़ुर्गों की सेवा भारी।

तुम्हारी परवरिश का इससे बड़ा क्या सबूत होगा,

कि अब तुम 'केयर टेकर' के भरोसे छोड़ते हो ज़िम्मेदारी।


महीने की सैलरी से जो उनका ख़र्च बटता है,

तो ऐसा लगता है जैसे कोई टैक्स कटता है।

भूल गए कि तुम्हारी ज़िद पर उन्होंने ख़ून बेचा था,

आज एक सीरप की क़ीमत से तुम्हारा बैंक बैलेंस घटता है।


उन्होंने तो लहू देकर तुम्हें इंसान बनाया था,

शरीफ़ों की तरह जीने का इक अरमान सजाया था।

मगर तुमने ज़माने की हवा में खुद को यूँ बेचा,

कि वो भी सोच में हैं—क्या यही तुमको सिखाया था?


मुबारक हो तुम्हें ये न्यू-एज (New-age) की आज़ादी,

बुज़ुर्गों के तजुर्बों को जो कहती है सिर्फ़ बर्बादी।

मगर याद रखना—जो बो रहे हो, वही कल काटोगे,

तुम्हारी भी औलाद सीख रही है तुम्हारी ये उस्तादी।




Monday, July 6, 2026

अभी इंसानियत बांकी है..


ये देश सौहार्द और प्रेम का था,
फिर किसने नफ़रत में बाँट दिया?
क्यों तौफ़ीक़ मारा गया मुठभेड़ में,
क्यों सूर्या को बेरहमी से काट दिया?

जिस भाईचारे की ख़ातिर बापू ने
राम और रहीम को गले लगाया,
फिर क्यों नफ़रत के सौदागरों ने
हर आँगन में ज़हर फैलाया?

क्या इतिहास की वही दरारें
आज भी दिलों में पलती हैं?
क्यों हर दौर की अंधी सियासतें
इंसानियत को छलती हैं?

धर्म के नाम पर इंसान कट रहे हैं,
जाति के नाम पर रिश्ते बँट रहे हैं;
संविधान अलमारियों में क़ैद पड़ा है,
और लोग संकीर्णताओं में सिमट रहे हैं।

रेलों की पटरियाँ आज भी पूछती हैं,
किसने इंसानों को मज़हब में तौला था?
किसकी ज़िद में सदियों का अपनापन
लाशों के बोझ तले डोला था?

आज भी दोनों ओर की धरती पर
नफ़रत की आँधी चलती है;
इस पार शाहिदा ख़ौफ़ में जीती है,
उस पार सरिता भी जलती है।

जिस सरज़मीं को लहू ने सींचा,
उसे मज़हब की फ़सलें क्या देंगी?
जब नफ़रत के बीज बोए जाएँगे,
तो आने वाली नस्लें क्या लेंगी?

क्या लिखूँ, किसके पक्ष में लिखूँ?
कलम भी काँपने लगी है आज;
सच कहना अब अपराध हुआ है,
झूठ पहनता फिरता है ताज।

बहुत बेचैनी होती है सोचकर,
क्या होगा मेरे इस देश का भला?
सच भी अब सहमा-सहमा फिरता है,
झूठ के पीछे चलता है काफ़िला।

लेकिन अभी कहानी बाक़ी है,
हर दिल की निगहबानी बाक़ी है;
नफ़रत चाहे जितनी तेज़ बहे,
इंसानियत की रवानी बाक़ी है।

आओ फिर से ऐसा भारत गढ़ें,
जहाँ हर दिल में सिर्फ़ प्यार हो;
नफ़रत हारे हर चौखट पर,
इंसानियत की ही जीत हर बार हो।


Wednesday, June 24, 2026

संबंधों की बंजर ज़मीन...

 


 कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,

कुछ लोग वफा करते ही नहीं।

अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,

तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।


अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,

पहले जैसे सँवरते ही नहीं।

जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,

वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।


इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,

अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।

एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,

अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।


क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही

बगिया को पानी से भरते ही नहीं।

अब राम-रहीम कभी एक राह से,

चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।


जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,

तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।

जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,

वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।


जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,

वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।

जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,

फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।


दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,

माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।

संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,

फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।



Monday, June 15, 2026

कॉकरोच का घोषणा पत्र..

बूढ़े और क्षीण विचारों को उखाड़ फेंके,
मैं वो नयी और ज्वलंत सोच हूँ,
इस सिस्टम के नस-नस में घुसकर बदलाव करूँगा,
मैं वो ईमानदार "कॉकरोच" हूँ।

अंधेरों की सीलन में भी जो
ज़िंदा रहने का साहस रखता है,
झूठे महलों की बुनियादों में
सच बनकर जो धँसता है।

ना सूटों की चमक से बिकता,
भाषण से भी बहलाया न जाने वाला आक्रोश हूँ,
तुम जिसको कीड़ा कहते फिरते "जज साहब" ,
मैं वही सवाल उठाता "कॉकरोच" हूँ।

तख़्तों के नीचे पलते डर को
दिन के उजाले में लाऊँगा,
जो खाते हैं जनता का हिस्सा
उनके चेहरे गिनवाऊँगा।

सत्ता के रसोड़े से उठता
गरीब जनता का बरसों का अफ़सोस हूँ,
उस बदबूदार व्यवस्था के आगे ना झुकने वाला,
मैं निडर अडिग "कॉकरोच" हूँ।

मैं नारा नहीं, चेतावनी हूँ,
सड़कों की सच्ची आह हूँ,
तुम्हारे बंद कमरों में घुसती
जनता की खुलती चाह हूँ।

अब डरना तुमको होगा साहब,
मैं जनता को जगाता हर रोज हूँ,
हर गली में, हर मोहल्ले में पलता,
मैं जिंदा खड़ा "कॉकरोच" हूँ।


Wednesday, May 20, 2026

सृष्टि का सार...


 लिंग से यदि घृणा करोगे,

सृष्टि कहाँ फिर जन्मेगी?

बीजों का अपमान करोगे,

धरती कब तक फल देगी?


एकलिंग की शरण न ली तो,

काल क्षमा फिर क्यों होगा?

जो जड़ से ही विमुख हुआ है,

उसका कौन भविष्य संजोएगा?


यह देह नहीं, यह दर्शन है,

जो कण-कण में बहता है।

सृजन-शक्ति के मौन स्रोत-सा,

हर जीवन में रहता है।


जिसने अहंकारों में आकर

इसके सत्य को ठुकराया,

उसने अपने ही हाथों से

अपना कल धुएँ में पाया।


लिंग न केवल रूप प्रकृति का,

यह संतुलन की भाषा है।

जिसने इसके मर्म को जाना,

उसके संग समय की आशा है।


न इसे भोग का विषय समझो,

न भय का अंधकार कहो।

यह तो चेतन दीप शाश्वत,

जिससे जीवन राह गहो।


संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,

बाकी सब अनुमान यहाँ।

स्वीकारों से जग चलता है,

घृणा बने श्मशान यहाँ।


यह युद्ध नहीं, संवादों का

अनहद खुलता द्वार है।

जो इसे समझ कर जी लेता,

वही सृष्टि का सार है।



Tuesday, April 21, 2026

फासलों के उस पार....



अब रोज़ तुझसे गुफ़्तगू कहाँ मयस्सर होती है,
मगर हर साँस में तेरी ही ख़बर होती है।
सच कहूँ, दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है,
रात की हर चुप्पी तेरे नाम बसर होती है।

ख़ुदा तुझे हर ग़म की हवा से बचाए रखे,
यहाँ अपनों की नज़र भी अक्सर ख़ंजर होती है।
मैं मुस्कुरा भी दूँ तो लोग वजह पूछते हैं,
किसे बताएँ कि दिल में कैसी हज़र होती है।
(हज़र = डर)

वो तेरी हँसी… जैसे सूखे लबों पर बारिश,
वो तेरी बात… जैसे रूह पर असर होती है।
तू महफ़िल में रहे तो रौशनी उतर आए,
तेरे बिन हर बस्ती भी वीरान शहर होती है।

तेरी ख़ामोशी भी अल्फ़ाज़ से भारी लगती,
कभी समंदर, कभी डूबती लहर होती है।
मीलों फ़ासलों में भी तू दिल से दूर नहीं,
कुछ मोहब्बतें जिस्म नहीं, रूह का सफ़र होती हैं।

वक़्त की धूल ने बहुत कुछ ढक लिया लेकिन,
तेरी याद अब भी दिल में चिराग़-ए-सहर होती है।
मैं हर दुआ में तेरा नाम यूँ रखता हूँ,
जैसे सजदे में कोई आख़िरी आस ठहर होती है।

अगर कभी तेरी आँखों में उदासी उतर आए,
समझना मेरी दुआओं में कहीं कसर होती है।
शिकवा तो नहीं इन फ़ासलों से अब मुझको,
बस तेरे ठीक होने की तलब उम्रभर होती है।

कभी जो थक के बैठ जाए तेरी मुस्कुराती रूह,
मेरी याद भी शायद तेरे पास हमसफ़र होती है।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे रहते हैं,
और कुछ अधूरे होकर भी ताउम्र असर होती है।

सच कहूँ, तेरे बाद भी ज़िंदगी चल तो रही है,
मगर हर धड़कन में एक ख़ाली सी लहर होती है।
तू मिले न मिले, ये मुक़द्दर की बात सही,
मोहब्बत तो वही है जो दुआ बनकर अमर होती है।



Tuesday, April 14, 2026

मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में… (एक अधूरी आवाज़ की पूरी कहानी)


मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
जहाँ रिश्ते कागज़ पर तय होते हैं,
और दिलों की धड़कनें
चुपचाप समझौते ढोती हैं।

मैं वही लड़की हूँ…
जिसे वक़्त ने सवाल बनाकर छोड़ दिया,
जिसकी हँसी को धोखे ने
धीरे-धीरे खामोश कर दिया।

कहते हैं — “बेटी, अब भूल जाओ…”
पर क्या टूटे भरोसे भी
इतनी आसानी से जुड़ जाते हैं?
क्या आँखों में जमे हुए डर
बस रस्मों से धुल जाते हैं?

कम सुनाई देता है मुझे…
हाँ, ये दुनियाँ के शोर शराबे.... 
पर मैं हर वो चीख़ सुनती हूँ
जो मेरे भीतर रोज़ मरती है।

हर वो सिसकी महसूस करती हूँ
जो मेरी चुप्पी में पलती है।
तुम्हारे रीति-रिवाज़
मेरे घावों पर मरहम नहीं,
बल्कि नमक बनकर गिरते हैं,
जहाँ “समाज” की इज़्ज़त के नाम पर
मेरे सपने हर रोज़ मरते हैं।

मैं नहीं बढ़ूँगी उस राह पर
जहाँ मेरी आवाज़ को
“लड़की की ज़िद” कहकर दबा दिया जाए,
जहाँ मेरा डर भी
“समझदारी” में बदल दिया जाए।

मैं थकी हूँ…
पर टूटी नहीं हूँ अभी,
मैं चुप हूँ…
पर झुकी नहीं हूँ अभी।

मेरे कान भले अनसुना कर दे,
पर मेरी रूह अब साफ़ सुनती है—
मेरे खिलाफ रची गई हर साजिश को.. 

इसलिए मैं कहती हूँ—
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
मैं अपने टूटे हिस्सों को
खुद ही जोड़ लूँगी,
पर किसी और के नाम पर
खुद को फिर से नहीं तोड़ूँगी।







Tuesday, March 31, 2026

वो खामोश है बेपरवाह नहीं....



सबको लगता है कि वो अब ख्याल नहीं करता है,
पैसे तो भेजता है मगर देखभाल नहीं करता है।
कोई जा के बता दो परदेश में बैठे बेटे का हाल,
वो क्यूँ किसी से कोई सवाल नहीं करता है।

वो चुप है तो समझो कि हालात बोलते है,
रातों के अंधेरों में उसके ख़्वाब डोलते है।
रोटी की तलाश में जो घर से दूर निकला था,
अब अश्क ही आँखों का दर्द तोलते है।

माँ की दुआएँ अभी तक साथ चलती है,
बाप की उम्मीदें भी चुपचाप पिघलती है।
हर महीने के पैसे में उसका दिल भी आता है,
बस लफ़्ज़ों की कमी है, तभी बातें नहीं निकलती है।

भीड़ में रहकर भी वो तन्हा-सा हो जाता है,
अपनों की यादों में अक्सर ही खो जाता है।
वो पूछे भी तो क्या पूछे, किससे अपने दर्द कहे,
इसलिए चुपचाप वो खामोशी का हो जाता है।

तुम इल्ज़ाम न दो उसको, वो मजबूर बहुत है,
उसकी भी आँखों में छुपा एक नूर बहुत है।
वो ख्याल नहीं करता—ये कहना भी गलत नहीं,
वो निभा रहा है सब कुछ, मगर दूर बहुत है।





Friday, March 20, 2026

शक्ति का प्रचंड स्वर : जय माँ दुर्गा



जगजननी के चरणों में दीपक की लौ जलती है,
सिंहवाहिनी के रूप में शक्ति स्वयं चलती है।
भारतीय संस्कृति की धारा माँ के वंदन में बहती है,
जय श्री दुर्गा की जयकार से सम्पूर्ण सृष्टि संभलती है।

शंख बजें, मंदिर गूँजें, हर आँगन मंगलमय हो,
जप-तप और साधना से जीवन सदैव दैवमय हो।
हिन्दुत्व की आत्मा गाती — धर्म रहे, संस्कार रहें,
माँ दुर्गा के आशीर्वाद से सब दुःख मिटें, न कोई भय हो।

ढोल-नगाड़े गगन गूँजें, हर दिशा में मधुर तान बहे,
आरती की थाल सजे, भक्ति-सागर समान बहे।
सनातन की पहचान है माँ के चरणों में समर्पण,
सदियों से जो संस्कृति है, वही जीवन का ध्यान रहे।

सिंह-गर्जना सी शक्ति से जब माँ का आशीष मिले,
असुरों के पाप धधक उठें, धर्म की रक्षा फलित चले।
आस्था की ज्योति जलती रहे हर दीपक की लौ में,
हर मंदिर, हर आँगन में माँ दुर्गा स्वयं संग चले।

माँ का व्रत है साधना, माँ का स्मरण है प्राण,
माँ का ही रूप है भारत, माँ का ही है सम्मान।
सहस्रों वर्षों की गाथा से देवी-शक्ति का परचम लहराए,
जय श्री दुर्गा के उद्घोष से गूँजे हर स्थान।

जयकारा उठे गगन में, दीपक हर द्वार में जलें,
नवरात्रि के नौ दिन माँ के आशीष सदा फलें।
भक्ति की ज्योति प्रज्वलित रहे, हर मनुज के हृदय में,
जय माँ दुर्गा की जयकार से कभी न श्रद्धा का सूर्य ढले।





Wednesday, December 31, 2025

अलविदा 2K25...





जा रहा है 2025

पीछे छोड़कर कुछ अधूरे ख़्वाब,

कुछ पूरे हुए वादे,

और ढेरों सबक—

जो वक़्त ने

ख़ामोशी से हथेली पर रख दिए।


इस साल ने

कभी हँसना सिखाया,

कभी आँसुओं से आँखें भर दीं,

कभी अपनों की अहमियत समझाई,

तो कभी भीड़ में

अकेले खड़े रहना।


अब दरवाज़े पर दस्तक हुयी है

2026 की—

नई धूप, नई राहें,

नए इरादों के साथ।

स्वागत है उस साल का

जो टूटे हौसलों को जोड़ दे,

थके क़दमों को

फिर चलना सिखा दे।


अलविदा 2025,

शुक्रिया हर दर्द, हर दुआ के लिए—

तूने जो छीना,

उससे ज़्यादा

हमें मज़बूत बनाकर दिया।


सुस्वागत 2026,

इतना सा वादा कर लेना—

कि इंसानियत ज़िंदा रहे,

सच की आवाज़ कमज़ोर न पड़े,

और मेहनत करने वाले हाथ

कभी खाली न लौटें।


एक नया सवेरा है,

एक नई उम्मीद के नाम—

स्वागत है 2026,

दिल खोलकर, पूरे सम्मान के साथ।

Happy New Year to All Of You.




Tuesday, December 23, 2025

कदर....




 


जब बंदर के हाथ लग जाए हल्दी,

या किसी को सबकुछ मिल जाए जल्दी—

तब कदर नहीं होती वक़्त की,

या घमंड कर देता चकनाचूर है।

यहाँ कोई हालातों का मारा,

तो कोई जीता जीवन भरपूर है।


जब अंधे के हाथ लग जाए बटेर,

या भिखारी के हाथ लग जाय धन का ढेर—

तब कदर नहीं होती मेहनत की,

समय भी खो देता अपना नूर है।

यहाँ कोई पानी-सा शीतल रहता,

किसी में आग-सा धधकता गुरूर है।


जब पूस की सर्दी में मिल जाए अलाव,

या बूढ़े जिस्म मे आ जाए ताव—

तब कदर नहीं रहती दाता की,

हर उम्र में इंसान कहीं न कहीं मगरूर है।

यहाँ कोई गैरों से भी होता बेहद करीब,

तो कोई अपनों से भी बहुत दूर है।


जब रणभूमि में मिल जाए संजीवनी,

या तरक्की हो दिन-दूनी रात-चौगुनी—

तब कदर नहीं रहती दवा और दुआ की,

जिंदगी में ऐसा समय भी आता ज़रूर है।

यहाँ कोई सोता शीशमहल के मखमली बिस्तर पर,

तो कोई रातों को जागने को भी मजबूर है।


जब प्यासे को मिल जाए दरिया का किनारा,

या किसी भटके राही को मिल जाए सहारा—

तब कदर नहीं रहती राहों की,

न मंज़िल का रहता कोई सुरूर है।

यहाँ कोई टूटकर भी मुस्कुराता रहता उम्रभर,

कोई सब पाकर भी भीतर से बिल्कुल चूर है।


जब खुशियाँ किसी के दामन में भर जाएँ पूरी,

या किसी के हिस्से आए बस तन्हाई और दूरी—

तब कदर नहीं होती सुकून की,

और हर ज़ख्म होता तब नासूर है।

यहाँ कोई अँधेरों में भी ढूंढ लेता है राह अपनी,

कोई रोशनी में रहकर भी बेनूर है।|




Friday, December 5, 2025

उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)


मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।

तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।

मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।

सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।







Friday, November 28, 2025

मरने से पहले...


कुछ तो समेट लूँ पंक्तियों में, अल्फ़ाज़ बिखरने से पहले,
क्या दो-चार पल जी लूँ मैं भी, यूँ मरने से पहले।
मेरी रूह काँप उठती है, तेरा किसी और का सोचते ही,
क्या उसके कदम ना डगमगाए होंगे, दगा करने से पहले।

अब किससे कहूँ — ये ज़ख़्म रफ़ू कर दे लफ़्ज़ों से,
मैं दर्द की हर हद छू लेना चाहता हूँ, गुज़रने से पहले।
अब साँसों में भी उतरने लगा है धीरे-धीरे ज़हर,
मैं खुद को समेट लेना चाहता हूँ, फिर बिखरने से पहले।

तुम मानो या ना मानो मेरी हाल-ए-दिल की दास्ताँ,
मैं सब कह देना चाहता हूँ, भीतर सन्नाटा भरने से पहले।
एक रोज़ तुम भी तड़पोगे किसी अज़ीज़ की ख़ातिर,
तब समझोगे — क्या होता है, रोज़ मरना मरने से पहले।

आज हर ख़ता मेरी ही नज़र आती होगी तुम्हें,
कभी मेरा हाल भी देखा था, यूँ सँवरने से पहले?
ये बिखरे ख़्वाब, ये तल्ख़ लहजा — सब तेरी इनायत है,
मेरा दिल भी साफ़ था कभी, तेरे दिल में ठहरने से पहले।

अब और लिखूँगा तो कलम भी रो पड़ेगी हालात पर,
तेरा एक आँसू ना गिरा — मेरी खुशियाँ हरने से पहले।
दो-चार दिन और दिखूँगा शायद तेरे मोहल्ले में,
मैं बस जी भर के देखना चाहता हूँ तुझे — बिछड़ने से पहले।








Sunday, November 2, 2025

मन मार रहा हूँ मैं..


ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं,

मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं।

बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में,

लगता है पिछले जन्मों का गुनाह उतार रहा हूँ मैं।


कितने ख्वाब, कितनी ख्वाहिशें समेटे था मन,

मगर अब बैरागी बन वक़्त गुज़ार रहा हूँ मैं।

किससे कहूँ — लौटा दे वो पुराने दिन,

जिनके लिए अब रोज़ बचपन को पुकार रहा हूँ मैं।

अब मन से भी चीज़ें बेमन सी हो जाती हैं,

बस पग गिन-गिन कर सफ़र कर पार रहा हूँ मैं।

इतना ऊब गया हूँ अब ज़िंदगी के ऊहापोह से,

शांति की ख़ातिर ख़ुद को न्यौछार रहा हूँ मैं।


बहुत किया प्रयत्न, पर परिणाम हमेशा खिलाफ ही रहा,

समझ नहीं आता कौन-सा कर्ज़ तार रहा हूँ मैं।

कुछ तो मैंने भी झेला होगा बहुत बोझिल मन से,

ऐसे ही नहीं, ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। 🙏



Wednesday, October 22, 2025

“वो जो गुनहगार नहीं थी — एक जिंदा लाश की दास्तान”



धीरे-धीरे ज़िंदगी से बाज़ी हारी जा रही है,
अश्क़ों को आँखों में लिए, वो बेचारी जा रही है।
पहले नोचा जिस्म, फिर दिल के भी टुकड़े कर दिए,
मौत से बदतर अब वो, ज़िंदगी गुज़ारी जा रही है।

ऐसा क्या गुनाह किया कि, साँस भी रुकती नहीं,
मृत्यु भी उसको बस, दूर से निहारी जा रही है।
मुफ़लिसी थी वजह या, प्रेम करना महँगा पड़ा,
सरेआम ही उसकी अब, इज़्ज़त उतारी जा रही है।

नादानी में जो हुआ, उससे बस इतना गुनाह,
जिस्म तुझको सौंप दिया, रूह भटकती जा रही है।
पेट में जो पल रहा है, दोनों की नादानी का फल है
फिर अकेले ही वो क्यूँ, कुलटा पुकारी जा रही है?

तुम ही हो उसके, बहते ख़ून के ज़िम्मेदार,
फिर क्यों अकेली उसको, ये बीमारी खा रही है?
मानो या न मानो, ज़मीर कोसता तो होगा ही,
देख, ग़लतियों की एक, जिंदा लाश तुम्हारी जा रही है।

गुनाह तेरे थे और, गुनहगार उसको ठहरा दिया,
अब दर्द सहने की वही, तेरी बारी आ रही है।
उसका रोना और, मायूसी भरे हर लम्हा
देख लौटकर अब, हिसाब लेने सारी आ रही है

उजाड़ा था फूल किसी, लाचार बाप के आँगन का,
आज अपनी बेटी के लिए, बगिया सँवारी जा रही है।
कर्म है लौटकर आता है, यक़ीनन,
देख खून मे लथपथ, बेटी तुम्हारी आ रही है।|

Wednesday, October 15, 2025

जिंदगी :- एक अजीब सी किताब



ज़िंदगी, तू अजीब सी किताब है,

कभी आँसू, कभी हँसी का सैलाब है।

कभी धूप में जलती उम्मीदों का सागर,

कभी छाँव में ठहरी कोई ख़्वाब-सा गुलाब है।


तेरे हर पन्ने पे कुछ लिखा सा लगता है,

कहीं अधूरा, कहीं मुकम्मल जहान टिका सा लगता है।

कभी ठोकरें देती है रास्तों पे चलने को,

कभी हाथ पकड़ कर सहारा देती है संभलने को।


कभी तू शिकवा बनकर छलकती है आँखों से,

कभी दुआ बनकर ठहर जाती है होंठों पे।

कभी खामोशियों में भी बोल उठती है,

कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास दिलाती है।


ज़िंदगी, तू सिखाती है —

हार में भी जीत की एक लकीर होती है,

हर अँधेरे के पीछे सुबह की ताबीर होती है।

गिरना भी मंज़िल का ही एक हिस्सा है,

सफलता के पीछे इंसान की तक़दीर होती है।


कभी दर्द, कभी गीत,

कभी मुस्कान, कभी प्रीत —

ज़िंदगी तू ना जाने कैसी पहेली है,

किसी के लिए सख्त प्रशिक्षक, किसी के लिए सहेली है।


Sunday, October 5, 2025

इकरार के आगे.....

 



दुनिया में बहुत कुछ है प्यार के आगे
सिर्फ मौत ही हल नहीं इंकार के आगे

पलकों पे सजाए रखें हैं तस्वीर तेरी लोग
लेकिन धुँधला पड़ जाता है दीदार के आगे

तेरी महफ़िल में बैठे ही जाँ देकर उठे
हम बचे कैसे रहते तेरे असरार के आगे

ग़म की सौग़ात लिए घूमे हैं सहरा-सहरा
दिल नहीं टिकता किसी भी गुलज़ार के आगे

तेरी आँखों का जादू है कि जंजीर का बोझ
क़ैद हो जाता है इंसाँ भी पहरेदार के आगे

जिस्म चाहे थक गया हो सफ़र की मुश्किल से
रूह रुक नहीं सकती अब मझधार के आगे

शबनमी ख्वाब सजे हैं तेरी पलकों के तले
चाँद भी सर झुकाता है रुख़सार के आगे

ख़ौफ़-ए-तन्हाई से डरता नहीं "हैरी" अब तो
रब की रहमत ही काफ़ी है ग़मगार के आगे

अब "स्याही" भी खामोश नहीं रह सकती दोस्त,
लफ़्ज़ सिर झुका देते हैं इकरार के आगे।





Thursday, September 25, 2025

बंद कमरों की सिसकियाँ...



 दीवारें चुप हैं, पर उनमें दरारें बहुत हैं,
चुप्पियों के पीछे दबी पुकारें बहुत हैं।

हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो छिपा है,
उस दर्द के समंदर के किनारे बहुत हैं।

घर है ये या कोई सज़ा की कोठरी,
यहाँ रिश्तों की बोली में बेगारे बहुत हैं।
जहाँ हर थप्पड़ के बाद यही सुनाई देता है—
“सिसकियाँ बंद करो, वरना विकल्प तुम्हारे बहुत हैं।”

कहीं माँ का आँचल जलती सिगरेट से जला,
कहीं डरे-सहमे पुरुष बेचारे बहुत हैं।
जिसे जैसे ढाला समाज ने, वैसे ही ढल गए,
क्योंकि ढोंगी समाज-सुधारक हमारे बहुत हैं।

रात की ख़ामोशी में चीखें गूँजती बहुत हैं,
खंडहर मकानों की अब भी दीवारें बहुत हैं।
अंदरूनी बातें हवा से भी तेज़ फैलती हैं,
प्लास्टर वाले घरों में भी दरारें बहुत हैं।

दर्द अब लिपस्टिक के नीचे छुपा रहता है,
आँखों में बेबसी के मगर नज़ारे बहुत हैं।
तहज़ीब सिखाई जाती है सिर्फ बेटियों को ही,
“खुले सांड से घूम रहे बेटे प्यारे बहुत हैं।”

रिश्तों की आड़ में ज़ुल्म सहते लोग यहाँ,
धीरे-धीरे ज़िंदगी से हारे बहुत हैं।
और समाज “मामला व्यक्तिगत” कहकर चुप है,
ये मीठा बोलने वाले भी खारे बहुत हैं।

अब वक़्त है इन बंद कमरों की साँकलें तोड़ने का,
हर ख़ामोशी को आवाज़ देने को मीनारें बहुत हैं।
मिलेगा न्याय और अधिकार हर मज़लूम को यहाँ,
दृढ़ और सशक्त अब भी दरबारें बहुत हैं।



Tuesday, September 16, 2025

“एक राष्ट्र, अनगिनत राग”


 हिमालय की गोद में बसा कश्मीर,

बर्फ़ की चादर में डल झील की तासीर।

हिमाचल की घाटियों में देवता उतरते हैं,

उत्तराखंड की नदियों में खुद शिव जल भरते हैं।


पंजाब की सरसों गाती है वीरों का गान,

हरियाणा की मिट्टी है मेहनत की शान।

गंगा-यमुना का मिलन से बनाता यू. पी. महान,

बिहार के गया व नालंदा ने दिया विश्व को ज्ञान।


लाल क़िले से गूँजती है स्वतंत्रता की शपथ,

क़ुतुब से संसद तक गढ़ा है लोकतंत्र का पथ ।

गंगा-जमुनी तहज़ीब की पनाह मे सबका एक मत,

दिल्ली है दिल, जहाँ से धड़कता है पूरा भारत।


झारखंड के जंगलों में ढोल की थाप,

छत्तीसगढ़ की धरती पर जनजातियों का आलाप।

ओडिशा की रथयात्रा खींचती है श्रद्धा की डोर,

बंगाल की हवा में अब भी साहित्य का शोर।


सिक्किम के फूलों से खुसबू हर पल,

अरुणाचल है भारत का सूर्योदय स्थल।

आसाम की चाय से महकती हर टपरी,

मेघालय के बादलों में दिखती है बेफिक्री।


नगालैंड के पर्व और रंग बिरंगे परिधान 

मणिपुर का नृत्य और खेल भारत के शान।

मिज़ोरम की पहाड़ियों से झरनों का गीत,

त्रिपुरा की गलियों में इतिहास का मीत।


गुजरात का गरबा और गिर के शेर 

राजस्थान मे ही है "भारत का मक्का" अजमेर ।

महाराष्ट्र की धड़कन है छत्रपती शिवाजी महान,

गोवा 'स्वतंत्रता-संग्राम' की अंतिम जीत की पहचान |


कर्नाटक की वीणा में गूंजते है प्राचीन राग,

केरल की नावों संग बहता शीतल बैराग।

तमिलनाडु में प्राचीन मंदिर और दक्खिन का पठार

आंध्र-तेलंगाना में प्रसिद्ध बालाजी और चारमीनार।


अंडमान-निकोबार दिखलाती स्वतंत्रता का समर्पण,

लक्षद्वीप के नीले पानी में झलकता है ईश्वर का दर्पण।

'लौहपुरुष' ने सब रियासतों को मिलाकर किया कार्य नेक 

"अब राज्य तमाम है, मगर भारत सबकी आत्मा एक"



Sunday, September 7, 2025

CPR दे रहे हैं....

 

वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर
सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं

तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले
किसी और को प्यार बेशुमार दे रहे हैं

किस हद तक देखना पड़ेगा दुनियां का ये दोगलापन
बेवफा लोग आजकल वफा पे ज्ञान यार दे रहे हैं

हमसे हर बात पर तकरार करने वाले,
अब खुलेआम लोगों को उधार दे रहे हैं


बंद कमरे मे एकांत वास हो जाते थे जो घंटों तक
हमसे दूरी क्या बड़ी सबको समय बार बार दे रहे हैं

चेहरे पे नकाब है या नक़ाब मे चेहरा
लगता है ऐसे लोगों को तवज्जो हम भी बेकार दे रहे हैं