Sunday, December 12, 2021
"वतन में शरणागत"...
Monday, November 29, 2021
क्यूँ बँट रहे हैं लोग..
जाति धर्म समुदाय के नाम पे कट रहे हैं लोग
इन्सानियत और अपनेपन को भुला चुके हैं
धीरे-धीरे परिवार मे तभी घट रहे हैं लोग
भाई-भाई से निभा दुश्मनी रहे यहाँ हैं लोग
पड़ोसी का जो हाल पूछते अब कहाँ हैं लोग
अब मैं भी फिरता रहता हूं खोजने को एक दुनियाँ
इन्सानियत को सबसे ऊपर समझते जहाँ हो लोग
मुँह मे राम बगल मे छुरा करते हैं सब लोग
अपनों की उन्नति देख जल मरते हैं अब लोग
उस कुंए को भी प्यासा छोड़ देती है ये दुनियाँ
शीतल जल उसका अपने गागर मे भरते हैं जब लोग
अपनों की ख़बर नहीं पर गैरों को मनाते हैं लोग
रावण के हैं भक्त बने और राम को जलाते हैं लोग
जिनके आदर्शों से चलती आ रहीं है दुनियाँ
धीरे-धीरे उन्हीं की साख को मिट्टी मे मिलाते हैं लोग
बेच बाप की जमीन नया कारोबार लगा रहे हैं लोग
बुढ़ी माँ बीमार है मगर पैसा उधार लगा रहे हैं लोग
कितने कमजोर हो गए रिश्ते दुनियां मे
अपनों के डर से गैरों को चौकीदार बना रहे हैं लोग
युधिष्ठिर को भुलाकर दुर्योधन बनने लगे हैं लोग
भ्रष्टाचार और नफरत के कीचड़ मे सनने लगे हैं लोग
अब धर्म की नीति नहीं बल्कि नीति के लिए धर्म को
तोड़ मरोड़ कर जनता पे मड़ने लगे हैं कुछ लोग
Tuesday, November 16, 2021
हाँ मैं एक पुरुष हूँ...
हाँ मैं एक पुरुष हूं
और पुरुषवादी भी, मगर त्रिया विरोधी कभी नहीं
बहुत स्वाभिमानी भी हूँ
मगर नारी का अपमान हो ये सोचता भी नहीं
स्त्री पुरुष तो हमसफ़र हैं जिंदगी के
एक दूसरे के खिलाफ कभी भी नहीं
अगर समझदारी और सम्मान हो रिश्ते मे तो
शक और विद्रोह की जगह कहीं नहीं
अगर मिलजुल कर करे सफर का आगाज
तो रोक सके राह ऐसी दीवार दुनियां मे बनी ही नहीं
नर हो या नारी दोनों परमब्रह्म की संताने है
हो ईश्वर की संतानो मे भेदभाव कभी भी नहीं
हाँ मैं एक पुरुष हूं
मगर स्त्री विरोधी कभी भी नहीं
(हैरी)
Tuesday, November 9, 2021
गठन या पतन?
क्या उखाड़ लिया करके गठन
एक नए राज्य उत्तराखण्ड का
जिसका आज तो है ही अंधकारमय
आने वाला कल भी भेंट चढ़ रहा सिर्फ पाखंड का
लाखों ने बलिदान देकर
ढेरों सपने सजाये थे
माताओं ने भी डंडे खाए थे
धूल मे मिल गई कुर्बानी पुरखों की
चंद नाकाम हुक्मरानों के क्रियाकलाप से
आज तड़प रहा है उत्तराखंड का हर नागरिक
पलायन और बेरोजगारी के विलाप से
क्या क्या सपने देखे थे
क्या इस राज्य का आज हाल है
यू. पी. मे थे तो भी अस्तित्व की लड़ाई थी
अलग तो हुए मगर अनुत्तरित आज भी कई सवाल है
थे सपने नए राज्य मे
नयी उन्नति नए कारोबार होगा
हर हाथ होगा समृद्ध और
ना कोई बेरोजगार होगा
पर आज स्थिति ऐसी हो गई
हम खुद से ही पिछड़ रहे हैं
हमारे जल जंगल खत्म हो रहे
रोजगार के अभाव से लाखों अपनों से बिछड़ हैं
हर युवा बेरोजगार बैठा है
हर गरीब तरसता है निवाले को
हर धाम ताकता है पुनर्निर्माण को
कौन हटाए उम्मीदों पे लगे इस जाले को
अब किससे क्या उम्मीद करें
किससे अब हम मतभेद करे
खुशियां मनाए इस हाल पे राज्य के
या अलग होने पे खेद करें.....?
(हैरी)
Thursday, October 21, 2021
इंसानियत की हत्या..
अभी अभी कुछ क्षण पहले भगवन
एक खिलती कली मुरझाई है
मां ने जिसे तैयार कर
सुंदर बैग और रिबन से चोटी बनाकर
हंसती खेलती भेजा था स्कूल
जो दोबारा लौटकर आ ना सकीं घर
साथियों से हाथ छुड़ाकर
बस चंद कदमों के फासले मे
ऐसी पडी नजर शैतान की
मूर्छित पडी दरिंदगी का शिकार हो कर
भगवान, यह आपका न्याय नहीं है
तुझसे भी लाखों शिकवे हैं
किसी घर की अमर रोशनी
बुझ गई ये तो सही नहीं है
तुम तो जग के रक्षक हो
क्यूँ लाज बचाने नहीं आए
सिर्फ युग परिवर्तन से क्षीण हो गई शक्ति
तुम्हीं महाकाल के समकक्षक हो
ज्ञान के द्वार से लौट रहीं थीं
कागज़ और कलम लिए हाथ मे
पलक झपकते ही दुनियां वीरान हो गई
घर मे जिसकी माँ बाट जोह रहीं थीं
आइए कुछ क्षण शोक करें
चलो फिर से कुछ मोमबत्तियाँ जलाये
हुक्मरान फिर झूठा दिलासा देंगे
फिर से मानवता वाला ढोंग करें
आंखों के सागर सूख गए
लोग बहुत रोये हैं आज
रोते हुए जिस्म बहुत देखे थे
आज रूह भी अश्कों मे डूब गए
बेबस मां बाप मर गए जीते जी
जब कानून अंधा और गूंगा हो गया
बेहसी ने ऐसा हस्र किया था
कोई कफन भी अलग न कर सके
इंसानियत के दिल पर चाकू
सदी की सबसे बुरी खबर
सबसे काला दिन इतिहास का
सदियों तक भूला ना जाएगा
किसी भी बलात्कारी को मत छोड़ो
दुनियां से निष्कासन करो
हे ईश्वर अब खुद नीचे आकर
अत्याचारियों का अंत करो|
Saturday, October 9, 2021
Saturday, October 2, 2021
मैं फिर मिलूंगा....
हम फिर मिलेंगे कभी....
शायद इस जनम मे तो नहीं
पर मेरा अटल विश्वास है
मैं तेरे दिल मे हमेशा रहूँगा
कहीं किसी सीप मे मोती की तरह
कभी हारिल की लकड़ी सा
अब आँखों से तेरी ओझल हो गया
चाह कर भी कहीं ढूंढ ना पाओगे
पर तुझमे मुझको ढूंढेगी दुनिया
जैसे चांद के संग चौकोर
जैसे इन्द्रधनुष और मोर
किस्से अपने या कुछ और
मैं तेरी यादों से लिपट जाउंगा
पर तुझे भी बहुत याद आऊंगा
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर पलकें तेरी भी जरूर भीगेगी
सैलाब ना सही चंद बूँदों से
तेरी आंख का काजल भी मिटेगा
या फ़िर यादों का फव्वारा
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें बनकर
तेरे बदन से रिसने लगूंगा
और एक ठंडक सी बन कर
तेरे सीने से लगूंगा
मुझे कुछ नहीं पता
पर इतना जरूर जानता हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह लम्हा मेरे साथ चलेगा
यह शरीर खत्म होता है
तो सब कुछ खत्म हो जाता है
पर ये नूरानी रूह के धागे
कायनात तक जोड़े रखते हैं
उन्हीं धागों के सहारे
मैं तुझसे जुड़ा मिलूंगा
बस इस जन्म की नींद से जागते ही
तुझे उस जन्म मे फ़िर मिलूंगा !!
(हैरी)
Monday, September 27, 2021
भटकता मुसाफिर..
आखिर तुम्हें क्या तकलीफ है पथिक
खामोश और तन्हा घूम रहे हो
सूरज भी झील मे डूब गया है,
और कोई पक्षी भी चहचहाता नहीं है।
आखिर तुम्हें क्या तकलीफ है पथिक
इतना गुमसुम और इतना दर्द ?
गिलहरी का भण्डार भरा हुआ है,
और नयी फसल पकने को है।
तुम्हारे माथे पर एक शिकन है,
पीड़ित नम पलके और रुआँसा के साथ,
तेरे सुर्ख गालों पर खिलता एक गुलाब
जल्दी मुरझा भी जाता है।
मैं स्वप्न में एक स्त्री से मिला,
जो हुस्न-ए-अप्सरा लिए थी ,
जिसके केशों ने पग छुए थे उसके
और आँखों मे समुद्र समाया था।
मैंने उसे सोलह श्रृंगार कराए,
और कंगन संग दिया इत्र भी
उसने मुझे यूँ प्यार से देखा
मानो सच्चा प्यार किया हो उसने भी |
मैंने उसे यूँ पलकों मे बिठाया,
फिर दिन भर कुछ और देखा नही,
पूर्णिमा के चांद सा चेहरा लिए ,
गुम हो गई वो बादलों मे कहीं ।
अब भी आंखे तलाश में उसके,
नित हर ओर उसे खोजती हैं
मानो कोई भोर का सपना,
जो मैंने देखा था कभी।
मैंने उसकी होंठों की उदासी में देखा,
एक भयानक चेतावनी और इंतकाम,
जब मैं जागा और खुद को पाया,
एक ठंडी पहाड़ी की तरफ।
और इसलिए मैं यहां भ्रमण करता हूं,
अकेला और बेरूखी लिए हुए,
मानो झील से सेज सूख गया हो,
और पक्षी भी कोई गाता नहीं यहाँ।
(हैरी)
Wednesday, September 22, 2021
एक रोज़ तुम्हें बताऊँगा..
क्यूँ सारे सपने धूमिल हो रहे
क्यूँ हवा का रुख बदल रहा है
फिर क्यूँ बारिश मे यादें उमड़ रहीं हैं
मैं तुम्हें एक दिन बताऊंगा
क्यूँ आसमाँ में घनघोर घटा छा जाती हैं
क्यूँ एक झोंका हवा का यादों को उड़ा देती है
फिर क्यों आती हैं आंसुओ की धारा
मैं तुम्हें एक दिन बताऊंगा
क्यूँ गुज़रे लम्हों की हर एक यादें
एक तेज छुरी सी चमकती है
फिर क्यूँ प्रणय मिलन से डरता है मन
मैं तुम्हें किसी रोज बताऊंगा
क्यूँ मद्धम मद्धम बढ़ता वेग वर्षा का
क्यूँ हर बूंद एक दर्द छोड़ती है
फिर क्यूँ घटा बरसती आँखों से
मैं तुम्हें किसी दिन बताऊंगा
क्यूँ आसमान में उठ रही अंगडाई
क्यूँ कोई भ्रम सा साथ होता है
फिर क्यूँ पागलों सी हालत है मेरी
मैं तुमको एक दिन बताऊंगा
काली घटाओं की गर्जन
और तूफान के बाद का सन्नाटा
चिंतित मन के हालात भी
मैं तुमको एक दिन बताऊँगा
तन्हा रातों का सबब और
हंसता चेहरा आंसू दर्द
सपने और हकीकत भी
मैं तुमको एक दिन दिखाऊंगा|
(Harry)
Thursday, September 9, 2021
जंग या जिंदगी?
हर युद्ध के बाद
किसी को तो राख समेटनी ही पड़ती है,
दीवारों से चिपकी चीखों को
धीरे-धीरे खुरचना ही पड़ता है।
किसी को तो हटाना ही होगा
मलबा सड़कों के किनारों तक,
तभी तो लाशों से भरी गाड़ियाँ
शहर के आर-पार जा सकेंगी।
किसी का पाँव तो धँसेगा ही
कीचड़, राख और खून में,
टूटी कुर्सियाँ, बिखरे खिलौने,
फटे हुए वस्त्र और बुझी आँखें—
सब गवाही देंगे
कि सभ्यता फिर हार गई।
किसी को तो रखनी होगी
नई दीवारों की बुनियाद,
और किसी को रोशनदान बनकर
घुटते कमरों में हवा उतारनी होगी।
यह आग अचानक नहीं भड़की,
बरसों से भीतर सुलग रही थी,
नफ़रत के सूखे पत्तों पर
स्वार्थ का तेल डाला गया था।
हथियार फिर चमकाए जा रहे हैं,
एक और युद्ध के लिए।
हमें फिर से उठना होगा,
एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा,
घर के कलह से लेकर
दुनिया के रणक्षेत्र तक
बिखरती शांति को
अपने हाथों से समेटना होगा।
याद है अभी भी वह छवि—
हाथ में बस एक साधारण छड़ी,
पर सत्य की लौ इतनी प्रखर
कि साम्राज्य की नींव हिल गई।
अहिंसा के दो शांत हथियारों ने
क्रूर सत्ता का तख़्त डुला दिया था।
आस्तीनों में आज भी
कई साँप पल रहे हैं,
भले कारतूसों पर जंग चढ़ी हो,
हौसले अब भी ज़िंदा हैं।
जाँबाज़ इरादे आज भी
कालिया नाग के फन कुचल सकते हैं।
घास के बीच फिर उग आई हैं
रक्तरंजित कुछ कोंपलें,
किसी को तो थामना होगा हाथ,
इन जर्जर टूटते हौसलों का।
क्योंकि हर युद्ध के बाद
सिर्फ शहर नहीं टूटते,
मनुष्य भी बिखरता है—
और किसी को तो
उसे फिर से इंसान बनाना पड़ता है।
— हैरी
Sunday, September 5, 2021
“शिक्षक दिवस : गुरु वंदना”
प्रभु तेरा गुणगान कर सकूँ
इस काबिल जिसने बनाया है
मेरे अज्ञानरूपी अंधकार में
ज्ञान का दीपक जलाया है|
उन गुरुओं के चरणों मे सदा
शीश अपना झुकाया है
प्रभु तेरे इस दिव्य स्वरुप को
आखर -आखर से सजाया है|
जिसने ज्ञान की जोत जलायी
जिसने अक्षर की पहचान दिया
गुरु के ज्ञान से होकर काबिल
सबको जग ने सम्मान दिया|
उस गुरु का मान रख सकें
प्रभु इतना वरदान देना
हम भी गुरु पग चिह्न पर चले
हमको सन्मार्ग की पहचान देना|
मेरे गुरु तारणहार है मेरे
मेरे पहले भगवान भी
हे गुरुवर! तुम ज्ञाता हो जग के
प्रभु तुल्य इंसान भी|
महिमा तुम्हारी वर्णन कर सकूँ
मुझमे इतना ज्ञान नहीं
वह मंदिर भी श्मशान सा मेरे लिए
जहां गुरुओं का सम्मान नहीं|
शब्द नहीं उचित उपमा को
अब कलम को देता विराम हूँ
गुरुवर आप अजर अमर रहें
चरणों मे करता प्रणाम हूँ
चरणों में करता प्रणाम हूँ||
गुरु का सम्मान केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवनभर की साधना है।
जिस समाज में गुरु का आदर नहीं, वहां शिक्षा का प्रकाश कभी स्थायी नहीं हो सकता।
आइए, इस शिक्षक दिवस पर हम प्रण करें कि गुरुजनों का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने आचरण और कर्मों से करेंगे।
💬 आपके जीवन में किस गुरु ने सबसे गहरा प्रभाव डाला? कृपया नीचे कमेंट में साझा करें।
शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
Tuesday, August 31, 2021
माँ का प्यार....
माँ की ममता है ही कुछ ऐसी
जिसे कोई समझा नहीं सकता,
यह सर्वोच्च आस्था से बना है
और इसके बलिदान से बड़ा कुछ हो नहीं सकता
यह पाक साफ और निःस्वार्थ है
इससे स्थायी क्या हो सकता है
ना कोई उसके प्यार को छीन सकता
और कुछ भी इसे ना मिटा सकता है |
यह धैर्य और क्षमाशीलता ना खोता
भले ही भरोसा रहा हो टूट
और यह कभी विफल नहीं होता
चाहे सबकुछ रहा हो छूट |
इसमे विश्वास अनंत अडिग है
चाहे जग निंदा करे चहु ओर
यह पूर्ण सुंदरता से चमकता
सबसे चमकीले रत्न सा कहीं दूर |
यह परिभाषित का मोहताज नहीं है,
यह सभी तर्कों की करे निंदा
रहस्यमय है अभी भी दुनियां के नज़रों मे
सृष्टि के अन्य रहस्यों की तरह,
एक बहुत ही शानदार चमत्कार
मनुष्य समझ ही नहीं सकता
यह एक चमत्कारिक सबूत है
खुदा के चामत्कारिक हाथों का |
(हैरी)
Friday, August 27, 2021
अंत नहीं होता....
जब मैं मरूँ, मेरा जनाज़ा निकाला जा रहा हो..
यह न सोचना कि मैं इस दुनिया को याद कर रहा हूँ
कोई अश्क न बहाए, शोक न करे , न ही कोई मन भारी करे...
मैं राक्षस के रसातल में नहीं पड़ रहा हूँ
जब देखो मेरा जनाजा जाते हुए,
पीड़ासक्त होकर रोना नहीं...
मैं अलविदा नहीं कह रहा हूंँ,
मैं तो शाश्वत प्रेम से मिल रहा हूंँ।
मुझे मेरी कब्र में छोड़ आओ, तो अलविदा मत कहना..
याद रखना कब्र तो जन्नत के लिए सिर्फ एक पर्दा महज है
तुमने मुझे केवल पंचतत्व मे विलीन होता देखा,
अब मुझे पंचतत्व होता भी देखो...
प्रकृति का अंत कैसे हो सकता है?
नहीं हो सकता...
मरण सूर्यास्त सा है, अंत सा लगता है
लेकिन वास्तव में यह भोर है.।
गोधूलि और भोर में सूर्य चंद का अंत नहीं होता...
दोनों मौजूद रहते हैं कहीं न् कहीं
जब मिट्टी तुम्हें खुद मे मिला लेती है,
तब आत्मा मुक्त हो जाती है।
क्या आपने कभी किसी बीज को धरती पर गिरे हुए
नव जीवन के साथ उगते नहीं देखा है?
फिर मनुष्य के बीज उगने पर संदेह कैसा ?
अंत नहीं होता प्रकृति का.....
(हैरी)
Sunday, August 15, 2021
ये देश रहना चाहिए
Sunday, August 1, 2021
Saturday, June 5, 2021
विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
Saturday, May 8, 2021
"हाँ मैं एक मजदूर हूँ"
Tuesday, April 6, 2021
दो गज दूरी....
Tuesday, March 23, 2021
"अमर सपूत"
Sunday, March 21, 2021
*ऐसा मेरा पहाड़ है*
Tuesday, March 16, 2021
मृत्यु तो शाश्वत सत्य है फिर किस बात से तू रहा है
Thursday, March 11, 2021
कागज कलम और एक शांत कोना...
Monday, March 8, 2021
गैर ही रह गया...
तुम नारी हो - अधूरी नहीं, अद्वितीय हो (women's day special)
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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क्यों अपना ही घर हमें, छोड़कर भागना पड़ा हुक्मरान थे नींद में, हमें जागना पड़ा पुस्तैनी ज़मीं छोड़ी, सपनों का मकाँ गया किलकारियों से गूँजता,...























