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Wednesday, October 15, 2025

जिंदगी :- एक अजीब सी किताब



ज़िंदगी, तू अजीब सी किताब है,

कभी आँसू, कभी हँसी का सैलाब है।

कभी धूप में जलती उम्मीदों का सागर,

कभी छाँव में ठहरी कोई ख़्वाब-सा गुलाब है।


तेरे हर पन्ने पे कुछ लिखा सा लगता है,

कहीं अधूरा, कहीं मुकम्मल जहान टिका सा लगता है।

कभी ठोकरें देती है रास्तों पे चलने को,

कभी हाथ पकड़ कर सहारा देती है संभलने को।


कभी तू शिकवा बनकर छलकती है आँखों से,

कभी दुआ बनकर ठहर जाती है होंठों पे।

कभी खामोशियों में भी बोल उठती है,

कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास दिलाती है।


ज़िंदगी, तू सिखाती है —

हार में भी जीत की एक लकीर होती है,

हर अँधेरे के पीछे सुबह की ताबीर होती है।

गिरना भी मंज़िल का ही एक हिस्सा है,

सफलता के पीछे इंसान की तक़दीर होती है।


कभी दर्द, कभी गीत,

कभी मुस्कान, कभी प्रीत —

ज़िंदगी तू ना जाने कैसी पहेली है,

किसी के लिए सख्त प्रशिक्षक, किसी के लिए सहेली है।


Tuesday, February 18, 2025

सच बेकार नहीं होता......

 


बिन शब्दों के कभी कोई
भाव विस्तार नहीं होता,
जैसे बिन खेवनहार के
भवसागर पार नहीं होता।

ऊँचा कुल या ऊँची पदवी
सम्मान का आधार नहीं होता,
गाँठ पड़ी हो रिश्तों में तो
पूर्ण अधिकार नहीं होता।

झूठ, फरेब और लालच का
सदैव जय-जयकार नहीं होता,
सच कष्टदायी भले लगे
मगर परिणाम बेकार नहीं होता।

मन दुःखी और तन पीड़ित हो
फिर कोई श्रृंगार नहीं होता,
छलिया कितना भी शातिर हो
उसका हर वार नहीं होता।

पहली ठोकर जो सीख दे दे
फिर वैसा प्रहार नहीं होता,
मात मिली हो जिस रिश्ते से
उस पर मन तैयार नहीं होता।

कवि की कपोल-कल्पनाओं में
हरदम सत्य का सार नहीं होता,
जो कुछ लिखा हो कोरे कागज़ पर
वैसा ही संसार नहीं होता।

हर चमकती चीज़ जगत में
सोने का भंडार नहीं होता,
चेहरों से पहचान हो जाए
इतना सरल किरदार नहीं होता।

मौन बहुत कुछ कह जाता है
हर उत्तर शब्दों का मोहताज नहीं होता,
जिसके मन में प्रेम बसा हो
वह कभी सचमुच लाचार नहीं होता।

कवि हरीश भ्यूंलवी कहता है,
हर सपना साकार नहीं होता,
लेकिन जो सच की राह चले
उसका जीवन बेकार नहीं होता।।



Thursday, October 26, 2023

कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है..



कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है

अर्द्ध मूर्छित है मगर बेहोश नहीं है

जो चाहे जिस भाषा शैली में गड़े 

व्यंगात्मक हो सकती है मगर रूपोश नहीं है 


कोई तारीफ लिखे कोई नाकामियाँ 

कोई व्याकुलता कोई संतोष लिखे 

कोई अमन शांति का पैगाम दे  

कोई उबलते जज्बातों का आक्रोश लिखे 


कुछ लिखते हैं अनकहे जज्बातों को 

कुछ अपने व्यंग्य का सैलाब लिखे 

कुछ धरती के मनोरम सौंदर्य का करते वर्णन 

कुछ कटु वर्णो से तेजाब लिखे 


कुछ प्रेम का सुंदर आभास लिखते हैं 

कुछ दबे कुचले लोगों की आवाज लिखे 

कुछ लिखते हैं खामोशी आपातकाल की 

कुछ 1857 की क्रांति का आगाज लिखे 


हर कोई अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर 

नए रचनाओं से नए शब्दों को आयाम देते हैं 

कोई फैलाते है जहर दुनियाँ मे 

कोई हर ओर शांति का पैगाम देते हैं 


बहरे है लोग भले गूंगी सरकार चाहे 

जंग जारी है कवि खामोश नहीं है 

कितनी कर लो अवहेलना विरोध मे 

कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है ||

बरदोश = छुपी हुयी 

रूपोंश = भागा हुआ, 




Friday, January 14, 2022

कविता है अखबार नहीं



 मैं कवि नहीं एक शिल्पी हूं

अक्षर अक्षर गड़कर, एक आकर बनाता हूं

पाषाण हृदयों को भी पिघला दे, ऐसी अद्भुत रचना से

अपनी कविता को साकार बनाता हूँ


रस छंद अलंकार और दोहा सौरठा से

होकर परे एक मुक्तक, शब्दों का संसार बनाता हूं

दबे कुचले हो या भूले बिसरे, गड़े मुर्दों को उखाड़ कर 

अपनी लेखनी का आधार बनाता हूँ


कलम नहीं रुकती मेरी, ना हाथ कांपते हैं

जब जब दुशासन के चरित्र, मेरे शब्द नापते हैं 

ना दहशत खोखली धमकी की, ना डर को भांपते है 

ना मीठे बोल लुभाते, ना किसी दुशासन का नाम जापते है 


सदा सत्य लिखने को, कलम आतुर रहती है 

अडिग विचारों को लिये, कोरे कागज पे स्याही बहती है 

ना अधर्म का पक्ष लेती, ना मूक दर्शक बनी रहती 

बिना अंजाम की परवाह किए, सिर्फ सच ही कहती है 


देख हौसला कलम का, एक जोश नया आता है 

लिखता हूँ कडवा सच, शायद कम को तब भाता है 

कायरता मे लुफ्त बोल, हमसे ना लिखे जाएंगे 

जब जब कलम उठेगी, हम सच ही लिख पाएंगे 


कलम तुलसी की ताकत है, भाड़े की तलवार नहीं 

कलम आलोचना झेलती है, प्रबल प्रशंसा की हकदार नहीं 

सत्य लिखने पे उठे अंगुलियाँ, हमको कोई गुबार नहीं 

मीठे बोलो से भर दे पन्ने, कविता है अखबार नहीं