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Monday, July 27, 2026
एक ख़याल… जो मरने नहीं देता
कौन है जो मेरे हिस्से का रो देगा,
सारे गहरे ज़ख्मों का दर्द धो देगा।
मैं अब चोला बदलना चाह रहा हूँ मगर,
कौन मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा हो देगा।
मैं नाकामयाब रहा घर की ज़िम्मेदारी उठाने में,
कौन मेरे आँगन में खुशी के बीज बो देगा।
मत पूछो कैसी कट रही है ये निष्ठुर ज़िंदगी,
किसी ने गर हाल भी पूछा, तो बंदा रो देगा।
खुद साया भी मुझे सच का आईना दिखाता है,
मैं हर इम्तिहान के लिए तैयार हूँ, ख़ुदा जो देगा।
बहुत ऊब गया हूँ इस ज़िंदगी के ताने-बाने से,
कौन बिखरे हुए ख़्वाबों की माला को पिरो देगा।
मैंने अपना समझकर सारे हालात साँझा किए थे,
क्या मालूम था, एक दिन वही शख़्स डुबो देगा।
रिश्तों की लाज में ख़ामोश डूबता ही रहा,
ये बंदा जिस्म के साथ अपनी साँसें भी खो देगा।
मेरे जाने के बाद सिर्फ़ मेरे घर का कमरा ही सूना पड़ेगा,
जो मेरे अपनों की आँखों को आँसुओं से भिगो देगा।
दुनिया को क्या ही परवाह है मेरी और मेरे ख़्वाबों की,
वो मेरी तस्वीर को किसी दीवार पर माला से संजो देगा।
कदम ख़ुद खुशी के लिए भी बढ़ा चुका हूँ बहुत बार,
मगर मेरे जाने का दर्द कोई ताउम्र ढो देगा।
बस इसी सोच में कदम खींच लेता हूँ पीछे,
मेरे बाद मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा कोई नहीं हो देगा।
Friday, December 5, 2025
उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)
मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।
तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।
मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।
सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।
Thursday, September 25, 2025
बंद कमरों की सिसकियाँ...
दीवारें चुप हैं, पर उनमें दरारें बहुत हैं,
चुप्पियों के पीछे दबी पुकारें बहुत हैं।
हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो छिपा है,
उस दर्द के समंदर के किनारे बहुत हैं।
घर है ये या कोई सज़ा की कोठरी,
यहाँ रिश्तों की बोली में बेगारे बहुत हैं।
जहाँ हर थप्पड़ के बाद यही सुनाई देता है—
“सिसकियाँ बंद करो, वरना विकल्प तुम्हारे बहुत हैं।”
कहीं माँ का आँचल जलती सिगरेट से जला,
कहीं डरे-सहमे पुरुष बेचारे बहुत हैं।
जिसे जैसे ढाला समाज ने, वैसे ही ढल गए,
क्योंकि ढोंगी समाज-सुधारक हमारे बहुत हैं।
रात की ख़ामोशी में चीखें गूँजती बहुत हैं,
खंडहर मकानों की अब भी दीवारें बहुत हैं।
अंदरूनी बातें हवा से भी तेज़ फैलती हैं,
प्लास्टर वाले घरों में भी दरारें बहुत हैं।
दर्द अब लिपस्टिक के नीचे छुपा रहता है,
आँखों में बेबसी के मगर नज़ारे बहुत हैं।
तहज़ीब सिखाई जाती है सिर्फ बेटियों को ही,
“खुले सांड से घूम रहे बेटे प्यारे बहुत हैं।”
रिश्तों की आड़ में ज़ुल्म सहते लोग यहाँ,
धीरे-धीरे ज़िंदगी से हारे बहुत हैं।
और समाज “मामला व्यक्तिगत” कहकर चुप है,
ये मीठा बोलने वाले भी खारे बहुत हैं।
अब वक़्त है इन बंद कमरों की साँकलें तोड़ने का,
हर ख़ामोशी को आवाज़ देने को मीनारें बहुत हैं।
मिलेगा न्याय और अधिकार हर मज़लूम को यहाँ,
दृढ़ और सशक्त अब भी दरबारें बहुत हैं।
Sunday, September 7, 2025
CPR दे रहे हैं....
वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर
सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं
तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले
किसी और को प्यार बेशुमार दे रहे हैं
किस हद तक देखना पड़ेगा दुनियां का ये दोगलापन
बेवफा लोग आजकल वफा पे ज्ञान यार दे रहे हैं
हमसे हर बात पर तकरार करने वाले,
अब खुलेआम लोगों को उधार दे रहे हैं
बंद कमरे मे एकांत वास हो जाते थे जो घंटों तक
हमसे दूरी क्या बड़ी सबको समय बार बार दे रहे हैं
चेहरे पे नकाब है या नक़ाब मे चेहरा
लगता है ऐसे लोगों को तवज्जो हम भी बेकार दे रहे हैं
Thursday, July 24, 2025
मुफ़लिसी के साए में...
कौड़ियों के दाम जब बिक रहे जज़्बात गर,
क़ैदख़ाना-सा लगे जब अपना ही हो घर।
फिर किस मक़ाम जाकर मिले कतरा-ए-सुकूँ,
जब आँख मूँदते ही सताए मुस्तक़बिल का डर।
जब बिन विषधर के ज़ुबाँ उगलने लगे ज़हर,
लफ़्ज़ बन जाएँ तीर, और हर ढाल बेअसर।
फिर क्यों न बिखरे कोई, ख़िज़ाँ के पत्तों-सा,
जब जिस्म बेच फिर भी न जले चूल्हा-ए-घर।
मजबूरियों का फंदा तब घोंटता है साँस को,
जब झूठ का शोर दबा दे सच की आवाज़ को।
कौन करता है यूँ ही ख़्वाहिशों का तर्पण,
कुछ तो बाँध रहा होगा हौसलों की परवाज़ को।
किसका करता है दिल तर्क इस जहान को,
मुफ़लिसी लूट लेती है ख़्वाब और अरमान को।
जब रूह में हर घड़ी सुलगती रहे बेचैनी,
तो मौत भी लगे राहत फिर थके इंसान को।
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले किसी और को प्यार...





