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Friday, December 5, 2025

उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)


मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।

तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।

मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।

सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।







Thursday, September 25, 2025

बंद कमरों की सिसकियाँ...



 दीवारें चुप हैं, पर उनमें दरारें बहुत हैं,
चुप्पियों के पीछे दबी पुकारें बहुत हैं।

हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे जो छिपा है,
उस दर्द के समंदर के किनारे बहुत हैं।

घर है ये या कोई सज़ा की कोठरी,
यहाँ रिश्तों की बोली में बेगारे बहुत हैं।
जहाँ हर थप्पड़ के बाद यही सुनाई देता है—
“सिसकियाँ बंद करो, वरना विकल्प तुम्हारे बहुत हैं।”

कहीं माँ का आँचल जलती सिगरेट से जला,
कहीं डरे-सहमे पुरुष बेचारे बहुत हैं।
जिसे जैसे ढाला समाज ने, वैसे ही ढल गए,
क्योंकि ढोंगी समाज-सुधारक हमारे बहुत हैं।

रात की ख़ामोशी में चीखें गूँजती बहुत हैं,
खंडहर मकानों की अब भी दीवारें बहुत हैं।
अंदरूनी बातें हवा से भी तेज़ फैलती हैं,
प्लास्टर वाले घरों में भी दरारें बहुत हैं।

दर्द अब लिपस्टिक के नीचे छुपा रहता है,
आँखों में बेबसी के मगर नज़ारे बहुत हैं।
तहज़ीब सिखाई जाती है सिर्फ बेटियों को ही,
“खुले सांड से घूम रहे बेटे प्यारे बहुत हैं।”

रिश्तों की आड़ में ज़ुल्म सहते लोग यहाँ,
धीरे-धीरे ज़िंदगी से हारे बहुत हैं।
और समाज “मामला व्यक्तिगत” कहकर चुप है,
ये मीठा बोलने वाले भी खारे बहुत हैं।

अब वक़्त है इन बंद कमरों की साँकलें तोड़ने का,
हर ख़ामोशी को आवाज़ देने को मीनारें बहुत हैं।
मिलेगा न्याय और अधिकार हर मज़लूम को यहाँ,
दृढ़ और सशक्त अब भी दरबारें बहुत हैं।



Sunday, September 7, 2025

CPR दे रहे हैं....

 

वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर
सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं

तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले
किसी और को प्यार बेशुमार दे रहे हैं

किस हद तक देखना पड़ेगा दुनियां का ये दोगलापन
बेवफा लोग आजकल वफा पे ज्ञान यार दे रहे हैं

हमसे हर बात पर तकरार करने वाले,
अब खुलेआम लोगों को उधार दे रहे हैं


बंद कमरे मे एकांत वास हो जाते थे जो घंटों तक
हमसे दूरी क्या बड़ी सबको समय बार बार दे रहे हैं

चेहरे पे नकाब है या नक़ाब मे चेहरा
लगता है ऐसे लोगों को तवज्जो हम भी बेकार दे रहे हैं

Thursday, July 24, 2025

मुफ़लिसी के साए में...



कौड़ियों के दाम जब बिक रहे जज़्बात गर,
क़ैदख़ाना-सा लगे जब अपना ही हो घर।
फिर किस मक़ाम जाकर मिले कतरा-ए-सुकूँ,
जब आँख मूँदते ही सताए मुस्तक़बिल का डर।

जब बिन विषधर के ज़ुबाँ उगलने लगे ज़हर,
लफ़्ज़ बन जाएँ तीर, और हर ढाल बेअसर।
फिर क्यों न बिखरे कोई, ख़िज़ाँ के पत्तों-सा,
जब जिस्म बेच फिर भी न जले चूल्हा-ए-घर।

मजबूरियों का फंदा तब घोंटता है साँस को,
जब झूठ का शोर दबा दे सच की आवाज़ को।
कौन करता है यूँ ही ख़्वाहिशों का तर्पण,
कुछ तो बाँध रहा होगा हौसलों की परवाज़ को।

किसका करता है दिल तर्क इस जहान को,
मुफ़लिसी लूट लेती है ख़्वाब और अरमान को।
जब रूह में हर घड़ी सुलगती रहे बेचैनी,
तो मौत भी लगे राहत फिर थके इंसान को।



Thursday, September 9, 2021

जंग या जिंदगी?


हर युद्ध के बाद

किसी को तो राख समेटनी ही पड़ती है,

दीवारों से चिपकी चीखों को

धीरे-धीरे खुरचना ही पड़ता है।

किसी को तो हटाना ही होगा

मलबा सड़कों के किनारों तक,

तभी तो लाशों से भरी गाड़ियाँ

शहर के आर-पार जा सकेंगी।

किसी का पाँव तो धँसेगा ही

कीचड़, राख और खून में,

टूटी कुर्सियाँ, बिखरे खिलौने,

फटे हुए वस्त्र और बुझी आँखें—

सब गवाही देंगे

कि सभ्यता फिर हार गई।

किसी को तो रखनी होगी

नई दीवारों की बुनियाद,

और किसी को रोशनदान बनकर

घुटते कमरों में हवा उतारनी होगी।

यह आग अचानक नहीं भड़की,

बरसों से भीतर सुलग रही थी,

नफ़रत के सूखे पत्तों पर

स्वार्थ का तेल डाला गया था।

हथियार फिर चमकाए जा रहे हैं,

एक और युद्ध के लिए।

हमें फिर से उठना होगा,

एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा,

घर के कलह से लेकर

दुनिया के रणक्षेत्र तक

बिखरती शांति को

अपने हाथों से समेटना होगा।

याद है अभी भी वह छवि—

हाथ में बस एक साधारण छड़ी,

पर सत्य की लौ इतनी प्रखर

कि साम्राज्य की नींव हिल गई।

अहिंसा के दो शांत हथियारों ने

क्रूर सत्ता का तख़्त डुला दिया था।

आस्तीनों में आज भी

कई साँप पल रहे हैं,

भले कारतूसों पर जंग चढ़ी हो,

हौसले अब भी ज़िंदा हैं।

जाँबाज़ इरादे आज भी

कालिया नाग के फन कुचल सकते हैं।

घास के बीच फिर उग आई हैं

रक्तरंजित कुछ कोंपलें,

किसी को तो थामना होगा हाथ,

इन जर्जर टूटते हौसलों का।

क्योंकि हर युद्ध के बाद

सिर्फ शहर नहीं टूटते,

मनुष्य भी बिखरता है—

और किसी को तो

उसे फिर से इंसान बनाना पड़ता है।

— हैरी