ज़र, ज़ोरू, ज़मीन की ख़ातिर बँट रहे हैं लोग,
जाति, धर्म, मज़हब के नाम पर कट रहे हैं लोग।
इंसानियत और अपनेपन को भूल बैठे इस क़दर,
धीरे-धीरे अपने ही घरों से घट रहे हैं लोग।
भाई-भाई के बीच अब दीवारें गढ़ रहे हैं लोग,
पड़ोसी का हाल पूछने से भी मुकर रहे हैं लोग।
मैं भी निकला हूँ तलाश में एक ऐसी बस्ती की,
जहाँ इंसान और इंसानियत की इज़्ज़त कर रहे हैं लोग।
मुँह में राम, बगल में छुरा लेकर चल रहे हैं लोग,
अपनों की कामयाबी देखकर भीतर जल रहे हैं लोग।
जिस कुएँ का पानी बरसों प्यास बुझाता रहा,
उसी कुएँ को प्यासा छोड़कर लौट निकल रहे हैं लोग।
अपनों की ख़बर नहीं, गैरों को मनाते हैं लोग,
राम का नाम लेकर कर्म रावण के निभाते हैं लोग।
जिनके आदर्शों से रोशन रही सदियों तक ये धरा,
धीरे-धीरे उन्हीं की साख मिटाते हैं लोग।
बाप की ज़मीन बेचकर महलों के ख़्वाब बुन रहे हैं लोग,
बीमार माँ को छोड़ पैसों का हिसाब गिन रहे हैं लोग।
रिश्तों की नींव कितनी खोखली हो चली है देखो,
अपनों से डरकर गैरों को पहरेदार चुन रहे हैं लोग।
युधिष्ठिर को भुलाकर दुर्योधन बन रहे हैं लोग,
नफ़रत और भ्रष्टाचार के दलदल में सन रहे हैं लोग।
धर्म अब जीवन का पथ नहीं, स्वार्थ का औज़ार बना,
अपने मतलब से शास्त्रों का अर्थ गढ़ रहे हैं लोग।
चेहरों पर मुस्कान, मगर दिलों में ज़हर लिए हैं लोग,
भीड़ में रहकर भी तन्हाई का सफ़र किए हैं लोग।
कभी इंसानियत की शान हुआ करती थी ये दुनिया,
आज इंसान की तलाश में भटक दर दर रहे हैं लोग।
Monday, November 29, 2021
आखिर क्यूँ बँट रहे हैं लोग..
Tuesday, November 16, 2021
हाँ मैं एक पुरुष हूँ...
Tuesday, November 9, 2021
गठन या पतन?
क्या उखाड़ लिया करके गठन
एक नए राज्य उत्तराखण्ड का
जिसका आज तो है ही अंधकारमय
आने वाला कल भी भेंट चढ़ रहा सिर्फ पाखंड का
लाखों ने बलिदान देकर
ढेरों सपने सजाये थे
माताओं ने भी डंडे खाए थे
धूल मे मिल गई कुर्बानी पुरखों की
चंद नाकाम हुक्मरानों के क्रियाकलाप से
आज तड़प रहा है उत्तराखंड का हर नागरिक
पलायन और बेरोजगारी के विलाप से
क्या क्या सपने देखे थे
क्या इस राज्य का आज हाल है
यू. पी. मे थे तो भी अस्तित्व की लड़ाई थी
अलग तो हुए मगर अनुत्तरित आज भी कई सवाल है
थे सपने नए राज्य मे
नयी उन्नति नए कारोबार होगा
हर हाथ होगा समृद्ध और
ना कोई बेरोजगार होगा
पर आज स्थिति ऐसी हो गई
हम खुद से ही पिछड़ रहे हैं
हमारे जल जंगल खत्म हो रहे
रोजगार के अभाव से लाखों अपनों से बिछड़ हैं
हर युवा बेरोजगार बैठा है
हर गरीब तरसता है निवाले को
हर धाम ताकता है पुनर्निर्माण को
कौन हटाए उम्मीदों पे लगे इस जाले को
अब किससे क्या उम्मीद करें
किससे अब हम मतभेद करे
खुशियां मनाए इस हाल पे राज्य के
या अलग होने पे खेद करें.....?
(हैरी)
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले किसी और को प्यार...


