Friday, September 25, 2026
अनगिनत सवाल अब भी हैं...
Monday, September 14, 2026
मिट्टी कुरेदोगे तो अपने मिलेंगे..
Wednesday, September 2, 2026
व़क्त का पहिया...
Tuesday, August 18, 2026
तुम ही तो हो....
एक लड़की है...
जो हर पाँच मिनट में कुछ न कुछ भूल जाती है,
कभी फ़ोन कहाँ रखा, कभी चश्मा कहाँ छोड़ा,
कभी खुद ही पूछकर अपना सवाल तक भूल जाती है।
फिर मासूम-सा चेहरा बनाकर कहती है—
"अरे यार... मैं तो भूल गई!"
और दुनिया की सारी नाराज़गी
उस एक मुस्कान के आगे हार जाती है।
वो चुलबुली है,
जैसे तितलियों ने हवा को हँसना सिखाया हो।
उसकी बातें कभी पूरी नहीं होतीं,
लेकिन दिल हमेशा पूरा जीत लेती हैं।
उसकी शरारतें किसी को सताने के लिए नहीं,
हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।
वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।
वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।
उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,
पर एक ऐसा दिल है
जिसमें छल की जगह नहीं,
सिर्फ़ अपनापन रहता है।
शायद उसे आज तक ये एहसास भी नहीं हुआ,
कि उसकी हर "अरे, मैं भूल गई..."
किसी की सबसे प्यारी याद बन चुकी है।
और अगर...
ये कविता पढ़कर किसी लड़की के होंठों पर
बिना वजह मुस्कान आ जाए,
और वो मन ही मन कहे—
"ये तो बिल्कुल मेरी बात है..."
तो समझ जाना,
कविता ने अपना सही पता ढूँढ़ लिया है।
Tuesday, August 11, 2026
दोगलेपन पर तंज़
Sunday, August 2, 2026
"रीलों में सिमटी पीढ़ी"
आँखों में सपनों का शोर नहीं।
हर पल चाहिए ताली दुनिया की,
पर भीतर कोई ठौर नहीं।
लाइक्स की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,
रिश्तों का आँगन भूल गए।
सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,
फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।
शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,
ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।
मेहनत से जो रिश्ता टूटा,
शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।
हर असहमति बनती नफ़रत,
हर आलोचना अपमान लगे।
दर्पण भी दुश्मन लगता है,
यदि सच का कोई निशान मिले।
याद रखो, इतिहास वही लिखता,
जो पसीने से कलम चलाता है।
क्षणिक प्रसिद्धि धूल बन जाती,
उत्तम चरित्र ही युगों तक यश पाता है।
हर युवा ऐसा नहीं होता,
बहुत-से दीप अभी भी जलते हैं।
जो श्रम, संस्कार और सत्य के संग,
कल के भारत को आगे लेकर चलते हैं।
"यह कविता किसी पूरी पीढ़ी पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर प्रश्न है जो मेहनत से अधिक दिखावे, चरित्र से अधिक प्रसिद्धि और सत्य से अधिक ट्रेंड को महत्व देती है।"
Monday, July 27, 2026
एक ख़याल… जो मरने नहीं देता
Thursday, July 16, 2026
बदली हुयी नस्लें...
तुम्हें अफ़सर बनाकर खुद तो बे-रोज़गार बैठे हैं।
तुम्हारी डिग्रियों ने बस तुम्हें ये अक़्ल बख़्शी है,
कि तुम ये सोच सको कि बूढ़े अब बेकार बैठे हैं।
तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,
कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?
जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,
तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।
कहाँ फुर्सत है तुमको जो बैठो दो घड़ी उनके पास,
तुम्हारी मोबाइल स्क्रीन पर ही तो बसती है दुनिया ख़ास।
वो ज़िंदा लाश बनकर घर के कोने में पड़े हैं,
तुम्हें शायद उन्हें खोने का बिल्कुल भी नहीं 'एहसास'।
वसीयत लिखवाते ही जो रंगत बदल जाती है तुम्हारी,
अचानक लगने लगती है बुज़ुर्गों की सेवा भारी।
तुम्हारी परवरिश का इससे बड़ा क्या सबूत होगा,
कि अब तुम 'केयर टेकर' के भरोसे छोड़ते हो ज़िम्मेदारी।
महीने की सैलरी से जो उनका ख़र्च बटता है,
तो ऐसा लगता है जैसे कोई टैक्स कटता है।
भूल गए कि तुम्हारी ज़िद पर उन्होंने ख़ून बेचा था,
आज एक सीरप की क़ीमत से तुम्हारा बैंक बैलेंस घटता है।
उन्होंने तो लहू देकर तुम्हें इंसान बनाया था,
शरीफ़ों की तरह जीने का इक अरमान सजाया था।
मगर तुमने ज़माने की हवा में खुद को यूँ बेचा,
कि वो भी सोच में हैं—क्या यही तुमको सिखाया था?
मुबारक हो तुम्हें ये न्यू-एज (New-age) की आज़ादी,
बुज़ुर्गों के तजुर्बों को जो कहती है सिर्फ़ बर्बादी।
मगर याद रखना—जो बो रहे हो, वही कल काटोगे,
तुम्हारी भी औलाद सीख रही है तुम्हारी ये उस्तादी।
Monday, July 6, 2026
अभी इंसानियत बांकी है..
Wednesday, June 24, 2026
संबंधों की बंजर ज़मीन...
कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,
कुछ लोग वफा करते ही नहीं।
अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,
तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।
अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,
पहले जैसे सँवरते ही नहीं।
जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,
वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।
इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,
अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।
एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,
अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।
क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही
बगिया को पानी से भरते ही नहीं।
अब राम-रहीम कभी एक राह से,
चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।
जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,
तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।
जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,
वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।
जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,
वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।
जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,
फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।
दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,
माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।
संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,
फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।
Monday, June 15, 2026
कॉकरोच का घोषणा पत्र..
Tuesday, June 2, 2026
पुरुषार्थ के पथ पर..
Wednesday, May 20, 2026
सृष्टि का सार...
सृष्टि कहाँ फिर जन्मेगी?
बीजों का अपमान करोगे,
धरती कब तक फल देगी?
एकलिंग की शरण न ली तो,
काल क्षमा फिर क्यों होगा?
जो जड़ से ही विमुख हुआ है,
उसका कौन भविष्य संजोएगा?
यह देह नहीं, यह दर्शन है,
जो कण-कण में बहता है।
सृजन-शक्ति के मौन स्रोत-सा,
हर जीवन में रहता है।
जिसने अहंकारों में आकर
इसके सत्य को ठुकराया,
उसने अपने ही हाथों से
अपना कल धुएँ में पाया।
लिंग न केवल रूप प्रकृति का,
यह संतुलन की भाषा है।
जिसने इसके मर्म को जाना,
उसके संग समय की आशा है।
न इसे भोग का विषय समझो,
न भय का अंधकार कहो।
यह तो चेतन दीप शाश्वत,
जिससे जीवन राह गहो।
संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,
बाकी सब अनुमान यहाँ।
स्वीकारों से जग चलता है,
घृणा बने श्मशान यहाँ।
यह युद्ध नहीं, संवादों का
अनहद खुलता द्वार है।
जो इसे समझ कर जी लेता,
वही सृष्टि का सार है।
Tuesday, April 21, 2026
फासलों के उस पार....
अब रोज़ तुझसे गुफ़्तगू कहाँ मयस्सर होती है,
मगर हर साँस में तेरी ही ख़बर होती है।
सच कहूँ, दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है,
रात की हर चुप्पी तेरे नाम बसर होती है।
ख़ुदा तुझे हर ग़म की हवा से बचाए रखे,
यहाँ अपनों की नज़र भी अक्सर ख़ंजर होती है।
मैं मुस्कुरा भी दूँ तो लोग वजह पूछते हैं,
किसे बताएँ कि दिल में कैसी हज़र होती है।
(हज़र = डर)
वो तेरी हँसी… जैसे सूखे लबों पर बारिश,
वो तेरी बात… जैसे रूह पर असर होती है।
तू महफ़िल में रहे तो रौशनी उतर आए,
तेरे बिन हर बस्ती भी वीरान शहर होती है।
तेरी ख़ामोशी भी अल्फ़ाज़ से भारी लगती,
कभी समंदर, कभी डूबती लहर होती है।
मीलों फ़ासलों में भी तू दिल से दूर नहीं,
कुछ मोहब्बतें जिस्म नहीं, रूह का सफ़र होती हैं।
वक़्त की धूल ने बहुत कुछ ढक लिया लेकिन,
तेरी याद अब भी दिल में चिराग़-ए-सहर होती है।
मैं हर दुआ में तेरा नाम यूँ रखता हूँ,
जैसे सजदे में कोई आख़िरी आस ठहर होती है।
अगर कभी तेरी आँखों में उदासी उतर आए,
समझना मेरी दुआओं में कहीं कसर होती है।
शिकवा तो नहीं इन फ़ासलों से अब मुझको,
बस तेरे ठीक होने की तलब उम्रभर होती है।
कभी जो थक के बैठ जाए तेरी मुस्कुराती रूह,
मेरी याद भी शायद तेरे पास हमसफ़र होती है।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे रहते हैं,
और कुछ अधूरे होकर भी ताउम्र असर होती है।
सच कहूँ, तेरे बाद भी ज़िंदगी चल तो रही है,
मगर हर धड़कन में एक ख़ाली सी लहर होती है।
तू मिले न मिले, ये मुक़द्दर की बात सही,
मोहब्बत तो वही है जो दुआ बनकर अमर होती है।
Tuesday, April 14, 2026
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में… (एक अधूरी आवाज़ की पूरी कहानी)
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
जहाँ रिश्ते कागज़ पर तय होते हैं,
और दिलों की धड़कनें
चुपचाप समझौते ढोती हैं।
मैं वही लड़की हूँ…
जिसे वक़्त ने सवाल बनाकर छोड़ दिया,
जिसकी हँसी को धोखे ने
धीरे-धीरे खामोश कर दिया।
कहते हैं — “बेटी, अब भूल जाओ…”
पर क्या टूटे भरोसे भी
इतनी आसानी से जुड़ जाते हैं?
क्या आँखों में जमे हुए डर
बस रस्मों से धुल जाते हैं?
कम सुनाई देता है मुझे…
हाँ, ये दुनियाँ के शोर शराबे....
पर मैं हर वो चीख़ सुनती हूँ
जो मेरे भीतर रोज़ मरती है।
हर वो सिसकी महसूस करती हूँ
जो मेरी चुप्पी में पलती है।
तुम्हारे रीति-रिवाज़
मेरे घावों पर मरहम नहीं,
बल्कि नमक बनकर गिरते हैं,
जहाँ “समाज” की इज़्ज़त के नाम पर
मेरे सपने हर रोज़ मरते हैं।
मैं नहीं बढ़ूँगी उस राह पर
जहाँ मेरी आवाज़ को
“लड़की की ज़िद” कहकर दबा दिया जाए,
जहाँ मेरा डर भी
“समझदारी” में बदल दिया जाए।
मैं थकी हूँ…
पर टूटी नहीं हूँ अभी,
मैं चुप हूँ…
पर झुकी नहीं हूँ अभी।
मेरे कान भले अनसुना कर दे,
पर मेरी रूह अब साफ़ सुनती है—
मेरे खिलाफ रची गई हर साजिश को..
इसलिए मैं कहती हूँ—
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
मैं अपने टूटे हिस्सों को
खुद ही जोड़ लूँगी,
पर किसी और के नाम पर
खुद को फिर से नहीं तोड़ूँगी।
Tuesday, March 31, 2026
वो खामोश है बेपरवाह नहीं....
Friday, March 20, 2026
शक्ति का प्रचंड स्वर : जय माँ दुर्गा
जगजननी के चरणों में दीपक की लौ जलती है,
सिंहवाहिनी के रूप में शक्ति स्वयं चलती है।
भारतीय संस्कृति की धारा माँ के वंदन में बहती है,
जय श्री दुर्गा की जयकार से सम्पूर्ण सृष्टि संभलती है।
शंख बजें, मंदिर गूँजें, हर आँगन मंगलमय हो,
जप-तप और साधना से जीवन सदैव दैवमय हो।
हिन्दुत्व की आत्मा गाती — धर्म रहे, संस्कार रहें,
माँ दुर्गा के आशीर्वाद से सब दुःख मिटें, न कोई भय हो।
ढोल-नगाड़े गगन गूँजें, हर दिशा में मधुर तान बहे,
आरती की थाल सजे, भक्ति-सागर समान बहे।
सनातन की पहचान है माँ के चरणों में समर्पण,
सदियों से जो संस्कृति है, वही जीवन का ध्यान रहे।
सिंह-गर्जना सी शक्ति से जब माँ का आशीष मिले,
असुरों के पाप धधक उठें, धर्म की रक्षा फलित चले।
आस्था की ज्योति जलती रहे हर दीपक की लौ में,
हर मंदिर, हर आँगन में माँ दुर्गा स्वयं संग चले।
माँ का व्रत है साधना, माँ का स्मरण है प्राण,
माँ का ही रूप है भारत, माँ का ही है सम्मान।
सहस्रों वर्षों की गाथा से देवी-शक्ति का परचम लहराए,
जय श्री दुर्गा के उद्घोष से गूँजे हर स्थान।
जयकारा उठे गगन में, दीपक हर द्वार में जलें,
नवरात्रि के नौ दिन माँ के आशीष सदा फलें।
भक्ति की ज्योति प्रज्वलित रहे, हर मनुज के हृदय में,
जय माँ दुर्गा की जयकार से कभी न श्रद्धा का सूर्य ढले।
Saturday, February 21, 2026
जागीर-ए-अश्क...
आँसू वासू रोना-धोना, सब तेरे खातिर तो है,
ये आँखें भी मानो तेरी, गिरवी रखी जागीर तो हैं।
तू दिखे चाँद-सा निर्मल, आग सी मिलती ताहिर तो है
तू लगता शरीफ लाख भले, दिमाग तेरा शातिर तो है।
तेरे लफ़्ज़ भले चाशनी से हों, घाव करे तो तीर से है
हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।
तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है
मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।
तू पास नहीं एहसास है मुझे, पर प्यार जताने को तस्वीर तो है
मैं रोऊँ तो बदरी छाए, दिल मे अब भी कोई पीर तो है
यहाँ रांझा बदल गया बेमतलब, पर बाट जोहती हीर तो है।
तेरे नाम की तस्बीह फेरते-फेरते , रूह आज भी शब्बीर तो है ।
सांसो में ताले पड़ गए, मन अब भी बड़ा अधीर तो है
शोहरत लाख बक्शी हो खुदा ने, दिल से तू फकीर तो है ।
एक दिन टूट जाएगा ये रिश्ता भी, सिर्फ माया का जंजीर तो है
मैं हार के भी तुझे जीत कहूँ, अब भी खुदा मेरा नासीर तो है ।
जागीर = 'संपत्ति' या 'रियासत'
ताहिर = 'पवित्र' या 'शुद्ध'
तासीर = 'प्रभाव' या 'असर
पीर = दर्द या वेदना:
शब्बीर = 'सुंदर', 'उत्तम चरित्र वाला' या 'नेक'
अधीर = 'धैर्यहीन' या 'बेचैन'
नासीर = 'मददगार' या 'सहायता करने वाला' |
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं, मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में, लगता है पिछले जन्मो...





















