Monday, July 6, 2026
अभी इंसानियत बांकी है..
Wednesday, June 24, 2026
संबंधों की बंजर ज़मीन...
कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,
कुछ लोग वफा करते ही नहीं।
अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,
तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।
अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,
पहले जैसे सँवरते ही नहीं।
जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,
वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।
इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,
अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।
एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,
अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।
क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही
बगिया को पानी से भरते ही नहीं।
अब राम-रहीम कभी एक राह से,
चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।
जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,
तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।
जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,
वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।
जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,
वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।
जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,
फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।
दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,
माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।
संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,
फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।
Monday, June 15, 2026
कॉकरोच का घोषणा पत्र..
Tuesday, June 2, 2026
पुरुषार्थ के पथ पर..
Wednesday, May 20, 2026
सृष्टि का सार...
सृष्टि कहाँ फिर जन्मेगी?
बीजों का अपमान करोगे,
धरती कब तक फल देगी?
एकलिंग की शरण न ली तो,
काल क्षमा फिर क्यों होगा?
जो जड़ से ही विमुख हुआ है,
उसका कौन भविष्य संजोएगा?
यह देह नहीं, यह दर्शन है,
जो कण-कण में बहता है।
सृजन-शक्ति के मौन स्रोत-सा,
हर जीवन में रहता है।
जिसने अहंकारों में आकर
इसके सत्य को ठुकराया,
उसने अपने ही हाथों से
अपना कल धुएँ में पाया।
लिंग न केवल रूप प्रकृति का,
यह संतुलन की भाषा है।
जिसने इसके मर्म को जाना,
उसके संग समय की आशा है।
न इसे भोग का विषय समझो,
न भय का अंधकार कहो।
यह तो चेतन दीप शाश्वत,
जिससे जीवन राह गहो।
संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,
बाकी सब अनुमान यहाँ।
स्वीकारों से जग चलता है,
घृणा बने श्मशान यहाँ।
यह युद्ध नहीं, संवादों का
अनहद खुलता द्वार है।
जो इसे समझ कर जी लेता,
वही सृष्टि का सार है।
Tuesday, April 21, 2026
फासलों के उस पार....
अब रोज़ तुझसे गुफ़्तगू कहाँ मयस्सर होती है,
मगर हर साँस में तेरी ही ख़बर होती है।
सच कहूँ, दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है,
रात की हर चुप्पी तेरे नाम बसर होती है।
ख़ुदा तुझे हर ग़म की हवा से बचाए रखे,
यहाँ अपनों की नज़र भी अक्सर ख़ंजर होती है।
मैं मुस्कुरा भी दूँ तो लोग वजह पूछते हैं,
किसे बताएँ कि दिल में कैसी हज़र होती है।
(हज़र = डर)
वो तेरी हँसी… जैसे सूखे लबों पर बारिश,
वो तेरी बात… जैसे रूह पर असर होती है।
तू महफ़िल में रहे तो रौशनी उतर आए,
तेरे बिन हर बस्ती भी वीरान शहर होती है।
तेरी ख़ामोशी भी अल्फ़ाज़ से भारी लगती,
कभी समंदर, कभी डूबती लहर होती है।
मीलों फ़ासलों में भी तू दिल से दूर नहीं,
कुछ मोहब्बतें जिस्म नहीं, रूह का सफ़र होती हैं।
वक़्त की धूल ने बहुत कुछ ढक लिया लेकिन,
तेरी याद अब भी दिल में चिराग़-ए-सहर होती है।
मैं हर दुआ में तेरा नाम यूँ रखता हूँ,
जैसे सजदे में कोई आख़िरी आस ठहर होती है।
अगर कभी तेरी आँखों में उदासी उतर आए,
समझना मेरी दुआओं में कहीं कसर होती है।
शिकवा तो नहीं इन फ़ासलों से अब मुझको,
बस तेरे ठीक होने की तलब उम्रभर होती है।
कभी जो थक के बैठ जाए तेरी मुस्कुराती रूह,
मेरी याद भी शायद तेरे पास हमसफ़र होती है।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे रहते हैं,
और कुछ अधूरे होकर भी ताउम्र असर होती है।
सच कहूँ, तेरे बाद भी ज़िंदगी चल तो रही है,
मगर हर धड़कन में एक ख़ाली सी लहर होती है।
तू मिले न मिले, ये मुक़द्दर की बात सही,
मोहब्बत तो वही है जो दुआ बनकर अमर होती है।
Tuesday, April 14, 2026
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में… (एक अधूरी आवाज़ की पूरी कहानी)
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
जहाँ रिश्ते कागज़ पर तय होते हैं,
और दिलों की धड़कनें
चुपचाप समझौते ढोती हैं।
मैं वही लड़की हूँ…
जिसे वक़्त ने सवाल बनाकर छोड़ दिया,
जिसकी हँसी को धोखे ने
धीरे-धीरे खामोश कर दिया।
कहते हैं — “बेटी, अब भूल जाओ…”
पर क्या टूटे भरोसे भी
इतनी आसानी से जुड़ जाते हैं?
क्या आँखों में जमे हुए डर
बस रस्मों से धुल जाते हैं?
कम सुनाई देता है मुझे…
हाँ, ये दुनियाँ के शोर शराबे....
पर मैं हर वो चीख़ सुनती हूँ
जो मेरे भीतर रोज़ मरती है।
हर वो सिसकी महसूस करती हूँ
जो मेरी चुप्पी में पलती है।
तुम्हारे रीति-रिवाज़
मेरे घावों पर मरहम नहीं,
बल्कि नमक बनकर गिरते हैं,
जहाँ “समाज” की इज़्ज़त के नाम पर
मेरे सपने हर रोज़ मरते हैं।
मैं नहीं बढ़ूँगी उस राह पर
जहाँ मेरी आवाज़ को
“लड़की की ज़िद” कहकर दबा दिया जाए,
जहाँ मेरा डर भी
“समझदारी” में बदल दिया जाए।
मैं थकी हूँ…
पर टूटी नहीं हूँ अभी,
मैं चुप हूँ…
पर झुकी नहीं हूँ अभी।
मेरे कान भले अनसुना कर दे,
पर मेरी रूह अब साफ़ सुनती है—
मेरे खिलाफ रची गई हर साजिश को..
इसलिए मैं कहती हूँ—
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
मैं अपने टूटे हिस्सों को
खुद ही जोड़ लूँगी,
पर किसी और के नाम पर
खुद को फिर से नहीं तोड़ूँगी।
Tuesday, March 31, 2026
वो खामोश है बेपरवाह नहीं....
Friday, March 20, 2026
शक्ति का प्रचंड स्वर : जय माँ दुर्गा
जगजननी के चरणों में दीपक की लौ जलती है,
सिंहवाहिनी के रूप में शक्ति स्वयं चलती है।
भारतीय संस्कृति की धारा माँ के वंदन में बहती है,
जय श्री दुर्गा की जयकार से सम्पूर्ण सृष्टि संभलती है।
शंख बजें, मंदिर गूँजें, हर आँगन मंगलमय हो,
जप-तप और साधना से जीवन सदैव दैवमय हो।
हिन्दुत्व की आत्मा गाती — धर्म रहे, संस्कार रहें,
माँ दुर्गा के आशीर्वाद से सब दुःख मिटें, न कोई भय हो।
ढोल-नगाड़े गगन गूँजें, हर दिशा में मधुर तान बहे,
आरती की थाल सजे, भक्ति-सागर समान बहे।
सनातन की पहचान है माँ के चरणों में समर्पण,
सदियों से जो संस्कृति है, वही जीवन का ध्यान रहे।
सिंह-गर्जना सी शक्ति से जब माँ का आशीष मिले,
असुरों के पाप धधक उठें, धर्म की रक्षा फलित चले।
आस्था की ज्योति जलती रहे हर दीपक की लौ में,
हर मंदिर, हर आँगन में माँ दुर्गा स्वयं संग चले।
माँ का व्रत है साधना, माँ का स्मरण है प्राण,
माँ का ही रूप है भारत, माँ का ही है सम्मान।
सहस्रों वर्षों की गाथा से देवी-शक्ति का परचम लहराए,
जय श्री दुर्गा के उद्घोष से गूँजे हर स्थान।
जयकारा उठे गगन में, दीपक हर द्वार में जलें,
नवरात्रि के नौ दिन माँ के आशीष सदा फलें।
भक्ति की ज्योति प्रज्वलित रहे, हर मनुज के हृदय में,
जय माँ दुर्गा की जयकार से कभी न श्रद्धा का सूर्य ढले।
Saturday, February 21, 2026
जागीर-ए-अश्क...
आँसू वासू रोना-धोना, सब तेरे खातिर तो है,
ये आँखें भी मानो तेरी, गिरवी रखी जागीर तो हैं।
तू दिखे चाँद-सा निर्मल, आग सी मिलती ताहिर तो है
तू लगता शरीफ लाख भले, दिमाग तेरा शातिर तो है।
तेरे लफ़्ज़ भले चाशनी से हों, घाव करे तो तीर से है
हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।
तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है
मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।
तू पास नहीं एहसास है मुझे, पर प्यार जताने को तस्वीर तो है
मैं रोऊँ तो बदरी छाए, दिल मे अब भी कोई पीर तो है
यहाँ रांझा बदल गया बेमतलब, पर बाट जोहती हीर तो है।
तेरे नाम की तस्बीह फेरते-फेरते , रूह आज भी शब्बीर तो है ।
सांसो में ताले पड़ गए, मन अब भी बड़ा अधीर तो है
शोहरत लाख बक्शी हो खुदा ने, दिल से तू फकीर तो है ।
एक दिन टूट जाएगा ये रिश्ता भी, सिर्फ माया का जंजीर तो है
मैं हार के भी तुझे जीत कहूँ, अब भी खुदा मेरा नासीर तो है ।
जागीर = 'संपत्ति' या 'रियासत'
ताहिर = 'पवित्र' या 'शुद्ध'
तासीर = 'प्रभाव' या 'असर
पीर = दर्द या वेदना:
शब्बीर = 'सुंदर', 'उत्तम चरित्र वाला' या 'नेक'
अधीर = 'धैर्यहीन' या 'बेचैन'
नासीर = 'मददगार' या 'सहायता करने वाला' |
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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वो जो कहते थे सांसे थम जायेंगी तुमसे बिछड़ कर सुना है किसी और को CPR दे रहे हैं तुम हो तुम थे और तुम्हीं रहोगे कहने वाले किसी और को प्यार...












