Monday, July 27, 2026
एक ख़याल… जो मरने नहीं देता
Sunday, November 2, 2025
मन मार रहा हूँ मैं..
ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं,
मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं।
बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में,
लगता है पिछले जन्मों का गुनाह उतार रहा हूँ मैं।
कितने ख्वाब, कितनी ख्वाहिशें समेटे था मन,
मगर अब बैरागी बन वक़्त गुज़ार रहा हूँ मैं।
किससे कहूँ — लौटा दे वो पुराने दिन,
जिनके लिए अब रोज़ बचपन को पुकार रहा हूँ मैं।
अब मन से भी चीज़ें बेमन सी हो जाती हैं,
बस पग गिन-गिन कर सफ़र कर पार रहा हूँ मैं।
इतना ऊब गया हूँ अब ज़िंदगी के ऊहापोह से,
शांति की ख़ातिर ख़ुद को न्यौछार रहा हूँ मैं।
बहुत किया प्रयत्न, पर परिणाम हमेशा खिलाफ ही रहा,
समझ नहीं आता कौन-सा कर्ज़ तार रहा हूँ मैं।
कुछ तो मैंने भी झेला होगा बहुत बोझिल मन से,
ऐसे ही नहीं, ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। 🙏
Friday, August 27, 2021
अंत नहीं होता प्रकृति का....
जब मैं मरूँ और मेरा जनाज़ा निकाला जा रहा हो,
यह न समझना कि मैं इस दुनिया को याद कर रहा हूँ।
कोई अश्क न बहाए, कोई शोक न करे,
न कोई अपना मन भारी करे।
मैं किसी अंधकार में नहीं खो रहा हूँ,
मैं तो एक नए उजाले की ओर बढ़ रहा हूँ।
जब देखो मेरा जनाज़ा जाते हुए,
पीड़ा से व्याकुल होकर रोना नहीं।
मैं अलविदा नहीं कह रहा हूँ,
मैं तो शाश्वत प्रेम से मिल रहा हूँ।
मुझे मेरी कब्र में छोड़ आओ, तो अलविदा मत कहना,
याद रखना, कब्र जन्नत तक जाने वाला एक पर्दा मात्र है।
तुमने मुझे पंचतत्व में विलीन होते देखा है,
अब उसी से पुनः जीवन लेते भी देखना।
प्रकृति का अंत कैसे हो सकता है?
नहीं, वह कभी समाप्त नहीं होती।
मरण सूर्यास्त-सा प्रतीत अवश्य होता है,
किन्तु वास्तव में वह एक नई भोर है।
गोधूलि और प्रभात में सूर्य का अंत नहीं होता,
वह बस एक क्षितिज से दूसरे क्षितिज की यात्रा करता है।
जब मिट्टी तुम्हें अपने भीतर समेट लेती है,
तब आत्मा बंधनों से मुक्त हो जाती है।
क्या तुमने कभी किसी बीज को
धरती में समाकर नवांकुर बनते नहीं देखा?
फिर मनुष्य के पुनर्जन्म पर संशय कैसा?
अंत नहीं होता प्रकृति का,
वह तो हर मृत्यु में नया जीवन बोती है।
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं, मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में, लगता है पिछले जन्मो...



