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Sunday, November 2, 2025

मन मार रहा हूँ मैं



ऐसा भी नहीं कि हार रहा हूँ मैं,

मगर धीरे-धीरे ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं।

बहुत कुछ देख लिया इन चार दिनों की उम्र में,

लगता है पिछले जन्मों का गुनाह उतार रहा हूँ मैं।


कितने ख्वाब, कितनी ख्वाहिशें समेटे था मन,

मगर अब बैरागी बन वक़्त गुज़ार रहा हूँ मैं।

किससे कहूँ — लौटा दे वो पुराने दिन,

जिनके लिए अब रोज़ बचपन को पुकार रहा हूँ मैं।

अब मन से भी चीज़ें बेमन सी हो जाती हैं,

बस पग गिन-गिन कर सफ़र कर पार रहा हूँ मैं।

इतना ऊब गया हूँ अब ज़िंदगी के ऊहापोह से,

शांति की ख़ातिर ख़ुद को न्यौछार रहा हूँ मैं।


बहुत किया प्रयत्न, पर परिणाम हमेशा खिलाफ ही रहा,

समझ नहीं आता कौन-सा कर्ज़ तार रहा हूँ मैं।

कुछ तो मैंने भी झेला होगा बहुत बोझिल मन से,

ऐसे ही नहीं, ज़िंदगी से मन मार रहा हूँ मैं। 🙏

Friday, August 27, 2021

अंत नहीं होता....



जब मैं मरूँ, मेरा जनाज़ा निकाला जा रहा हो.. 

 यह न सोचना कि मैं इस दुनिया को याद कर रहा हूँ 

 कोई अश्क न बहाए, शोक न करे , न ही कोई मन भारी करे... 

मैं राक्षस के रसातल में नहीं पड़ रहा हूँ


 जब देखो मेरा  जनाजा जाते हुए, 

  पीड़ासक्त होकर रोना नहीं... 

मैं अलविदा नहीं कह रहा हूंँ, 

मैं तो शाश्वत प्रेम से मिल रहा हूंँ।


मुझे मेरी कब्र में छोड़ आओ, तो अलविदा मत कहना.. 

 याद रखना कब्र तो जन्नत के लिए सिर्फ एक पर्दा महज है

तुमने मुझे केवल पंचतत्व मे विलीन होता देखा, 

अब मुझे पंचतत्व होता भी देखो... 


प्रकृति का अंत कैसे हो सकता है?

 नहीं हो सकता... 

 मरण सूर्यास्त सा है, अंत सा लगता है 

लेकिन वास्तव में यह भोर है.। 

गोधूलि और भोर में सूर्य चंद का अंत नहीं होता... 

दोनों मौजूद रहते हैं कहीं न् कहीं


जब मिट्टी तुम्हें खुद मे मिला लेती है,

तब आत्मा मुक्त हो जाती है।

 क्या आपने कभी किसी बीज को धरती पर गिरे हुए 

नव जीवन के साथ  उगते नहीं देखा है?

फिर मनुष्य  के बीज उगने पर संदेह कैसा ?

 अंत नहीं होता प्रकृति का..... 

                                       (हैरी)