Thursday, July 16, 2026

बदली हुयी नस्लें...


 तुम्हारी हर तरक़्क़ी का वो जो आधार बैठे हैं,

तुम्हें अफ़सर बनाकर खुद तो बे-रोज़गार बैठे हैं।

तुम्हारी डिग्रियों ने बस तुम्हें ये अक़्ल बख़्शी है,

कि तुम ये सोच सको कि बूढ़े अब बेकार बैठे हैं।


तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,

कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?

जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,

तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।


कहाँ फुर्सत है तुमको जो बैठो दो घड़ी उनके पास,

तुम्हारी मोबाइल स्क्रीन पर ही तो बसती है दुनिया ख़ास।

वो ज़िंदा लाश बनकर घर के कोने में पड़े हैं,

तुम्हें शायद उन्हें खोने का बिल्कुल भी नहीं 'एहसास'।


वसीयत लिखवाते ही जो रंगत बदल जाती है तुम्हारी,

अचानक लगने लगती है बुज़ुर्गों की सेवा भारी।

तुम्हारी परवरिश का इससे बड़ा क्या सबूत होगा,

कि अब तुम 'केयर टेकर' के भरोसे छोड़ते हो ज़िम्मेदारी।


महीने की सैलरी से जो उनका ख़र्च बटता है,

तो ऐसा लगता है जैसे कोई टैक्स कटता है।

भूल गए कि तुम्हारी ज़िद पर उन्होंने ख़ून बेचा था,

आज एक सीरप की क़ीमत से तुम्हारा बैंक बैलेंस घटता है।


उन्होंने तो लहू देकर तुम्हें इंसान बनाया था,

शरीफ़ों की तरह जीने का इक अरमान सजाया था।

मगर तुमने ज़माने की हवा में खुद को यूँ बेचा,

कि वो भी सोच में हैं—क्या यही तुमको सिखाया था?


मुबारक हो तुम्हें ये न्यू-एज (New-age) की आज़ादी,

बुज़ुर्गों के तजुर्बों को जो कहती है सिर्फ़ बर्बादी।

मगर याद रखना—जो बो रहे हो, वही कल काटोगे,

तुम्हारी भी औलाद सीख रही है तुम्हारी ये उस्तादी।




Monday, July 6, 2026

अभी इंसानियत बांकी है..


ये देश सौहार्द और प्रेम का था,
फिर किसने नफ़रत में बाँट दिया?
क्यों तौफ़ीक़ मारा गया मुठभेड़ में,
क्यों सूर्या को बेरहमी से काट दिया?

जिस भाईचारे की ख़ातिर बापू ने
राम और रहीम को गले लगाया,
फिर क्यों नफ़रत के सौदागरों ने
हर आँगन में ज़हर फैलाया?

क्या इतिहास की वही दरारें
आज भी दिलों में पलती हैं?
क्यों हर दौर की अंधी सियासतें
इंसानियत को छलती हैं?

धर्म के नाम पर इंसान कट रहे हैं,
जाति के नाम पर रिश्ते बँट रहे हैं;
संविधान अलमारियों में क़ैद पड़ा है,
और लोग संकीर्णताओं में सिमट रहे हैं।

रेलों की पटरियाँ आज भी पूछती हैं,
किसने इंसानों को मज़हब में तौला था?
किसकी ज़िद में सदियों का अपनापन
लाशों के बोझ तले डोला था?

आज भी दोनों ओर की धरती पर
नफ़रत की आँधी चलती है;
इस पार शाहिदा ख़ौफ़ में जीती है,
उस पार सरिता भी जलती है।

जिस सरज़मीं को लहू ने सींचा,
उसे मज़हब की फ़सलें क्या देंगी?
जब नफ़रत के बीज बोए जाएँगे,
तो आने वाली नस्लें क्या लेंगी?

क्या लिखूँ, किसके पक्ष में लिखूँ?
कलम भी काँपने लगी है आज;
सच कहना अब अपराध हुआ है,
झूठ पहनता फिरता है ताज।

बहुत बेचैनी होती है सोचकर,
क्या होगा मेरे इस देश का भला?
सच भी अब सहमा-सहमा फिरता है,
झूठ के पीछे चलता है काफ़िला।

लेकिन अभी कहानी बाक़ी है,
हर दिल की निगहबानी बाक़ी है;
नफ़रत चाहे जितनी तेज़ बहे,
इंसानियत की रवानी बाक़ी है।

आओ फिर से ऐसा भारत गढ़ें,
जहाँ हर दिल में सिर्फ़ प्यार हो;
नफ़रत हारे हर चौखट पर,
इंसानियत की ही जीत हर बार हो।


Wednesday, June 24, 2026

संबंधों की बंजर ज़मीन...

 


 कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,

कुछ लोग वफा करते ही नहीं।

अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,

तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।


अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,

पहले जैसे सँवरते ही नहीं।

जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,

वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।


इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,

अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।

एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,

अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।


क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही

बगिया को पानी से भरते ही नहीं।

अब राम-रहीम कभी एक राह से,

चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।


जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,

तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।

जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,

वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।


जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,

वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।

जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,

फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।


दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,

माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।

संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,

फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।