एक लड़की है...
जो हर पाँच मिनट में कुछ न कुछ भूल जाती है,
कभी फ़ोन कहाँ रखा, कभी चश्मा कहाँ छोड़ा,
कभी खुद ही पूछकर अपना सवाल तक भूल जाती है।
फिर मासूम-सा चेहरा बनाकर कहती है—
"अरे यार... मैं तो भूल गई!"
और दुनिया की सारी नाराज़गी
उस एक मुस्कान के आगे हार जाती है।
वो चुलबुली है,
जैसे तितलियों ने हवा को हँसना सिखाया हो।
उसकी बातें कभी पूरी नहीं होतीं,
लेकिन दिल हमेशा पूरा जीत लेती हैं।
उसकी शरारतें किसी को सताने के लिए नहीं,
हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।
वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।
वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।
उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,
पर एक ऐसा दिल है
जिसमें छल की जगह नहीं,
सिर्फ़ अपनापन रहता है।
शायद उसे आज तक ये एहसास भी नहीं हुआ,
कि उसकी हर "अरे, मैं भूल गई..."
किसी की सबसे प्यारी याद बन चुकी है।
और अगर...
ये कविता पढ़कर किसी लड़की के होंठों पर
बिना वजह मुस्कान आ जाए,
और वो मन ही मन कहे—
"ये तो बिल्कुल मेरी बात है..."
तो समझ जाना,
कविता ने अपना सही पता ढूँढ़ लिया है।


