जब सिंहासनों पर अन्याय का अभिमान चढ़ा होता है,
जब धर्म स्वयं सभा के बीच लहूलुहान पड़ा होता है,
जब सत्य विवश हो मौन कहीं कोने में विस्तृत है,
तब कोई राम मनुष्य बन धरा पर अवतरित होता है।
अयोध्या ने उस प्रभात न एक बालक को जन्म दिया,
युग के संकट का उत्तर, मानव को धर्म दिया।
दशरथ के आँगन उतरा था केवल राजकुमार नहीं,
वह था कालजयी संकल्प, कोई साधारण अवतार नहीं।
नेत्रों में शीतल करुणा, भुजदंडों में वज्र प्रहार था,
वाणी में गंगा की निर्मलता, मुखमंडल पर सूर्य-विहार था।
कौशल्या ने जिस शिशु को अंक में सेंका था,
युग ने उसमें अपना भावी धर्मरक्षक देखा था।
विश्वामित्र ने उस बालक में ज्वाला को पहचान लिया,
सोए हुए सिंह के भीतर भवितव्य को जान लिया।
ले गए वन, जहाँ अधर्म ने तप की जड़ें हिलाई थीं,
जहाँ ऋषियों की वाणी तक भय से काँप उठी थीं।
राम चले — और पीछे जैसे काल स्वयं चलता था,
लक्ष्मण का क्रोध प्रलय-मेघ-सा मचलता था।
ताड़का का अभिमान गिरा, वन का तम टूट गया,
पहली ही टंकार से अधर्म का स्वर फूट गया।
मिथिला की सभा में पहुँचे जब रघुवर धनुर्धर बनकर,
वीरों के मस्तक झुकते थे उनके तेज को पढ़कर।
शिवधनुष टूटा तो केवल लकड़ी का न नाद था,
वह युगों के जड़ अभिमान का भी अवसाद था।
राज्याभिषेक की वेला थी, दीपों से सजी दिशाएँ थीं,
उत्सव के स्वर से पुलकित अयोध्या की हवाएँ थीं।
किन्तु विधि ने उस क्षण जैसे वज्राघात कर डाला,
एक वरदान ने राजमहल का हृदय आहत कर डाला।
राम ने सुना — और मुख पर क्षोभ का चिह्न न आया,
जैसे हिमालय पर भीषण तूफान असर न कर पाया।
त्याग दिया राजसिंहासन जैसे तिनका कोई हो,
मर्यादा के सम्मुख वैभव मानो क्षणभंगुर रोई हो।
जहाँ अधिकार से पहले कर्तव्य खड़ा होता है,
जहाँ ताज से ऊपर पिता का वचन बड़ा होता है।
रोई अयोध्या, रोया नभ, रोई राजमहल की दीवार,
जैसे सूर्य उतर गया हो छोड़ क्षितिज का द्वार।
पर राम चले — मुख पर अटल शांति का उजास लिए,
वनपथ को भी धर्मयुद्ध का इतिहास किए।
अग्निपरीक्षा सीता से पहले राम की ले डाली,
दुनिया रचने वाले की रचना कितनी निराली।
वन ने राम को तपाया जैसे अग्नि तपाती स्वर्ण,
हर पीड़ा ने उनके भीतर गढ़ा नया एक वर्ण।
शबरी के बेरों में भक्ति का मधुर लोक मिला,
केवट के श्रम में जीवन का अद्भुत श्लोक मिला।
किन्तु जब सिया को छल से रावण हर ले गया,
राम के भीतर का मौन महासागर भर ले गया।
यह केवल पत्नी-वियोग का नहीं संताप था,
यह धर्म की मर्यादा पर सीधा अभिशाप था।
फिर लंका तक सेतु बँधा विश्वास की शिलाओं से,
सागर झुका राम के अदम्य संकल्प की छायाओं से।
हनुमान गए — और ज्वाला बन स्वर्ण-नगर में छा गए,
अहंकार के शिखरों तक भय के बादल ला गए।
रणभूमि में रावण खड़ा था जैसे ज्वाला का पर्वत,
दस मुख, बीस भुजाएँ, अभिमान से भरा समर में तत्पर।
पर राम खड़े थे जैसे मौन हिमालय का शिखर,
स्थिर, गंभीर, धैर्यपूर्ण, भीतर अग्नि अमर।
जब बाण छूटा रघुवर का, नभ भी ठिठक गया,
अधर्म का महल उसी क्षण भीतर से चिटक गया।
गिरा रावण — और साथ गिरा युगों का अभिमान,
धर्म ने फिर पहना जग में अपना स्वर्णिम सम्मान।
जब चौदह वर्षों बाद अयोध्या ने राम को पाया,
हर नेत्र ने अश्रु में अपना सौभाग्य समाया।
दीप जले केवल घरों में ही नहीं, हृदयों में भी,
विश्वास लौटा था जन-जन की धड़कनों में भी।
तब से हर अमावस पर यह पर्व मनाया जाता है,
अँधेरे के विरुद्ध दीपक जगमगाया जाता है।
राम लौटते हैं जब भी मन के सूने द्वारों में,
दीवाली उतर आती है जीवन के अंधियारों में।


