Monday, July 6, 2026

अभी इंसानियत बांकी है..


ये देश सौहार्द और प्रेम का था,
फिर किसने नफ़रत में बाँट दिया?
क्यों तौफ़ीक़ मारा गया मुठभेड़ में,
क्यों सूर्या को बेरहमी से काट दिया?

जिस भाईचारे की ख़ातिर बापू ने
राम और रहीम को गले लगाया,
फिर क्यों नफ़रत के सौदागरों ने
हर आँगन में ज़हर फैलाया?

क्या इतिहास की वही दरारें
आज भी दिलों में पलती हैं?
क्यों हर दौर की अंधी सियासतें
इंसानियत को छलती हैं?

धर्म के नाम पर इंसान कट रहे हैं,
जाति के नाम पर रिश्ते बँट रहे हैं;
संविधान अलमारियों में क़ैद पड़ा है,
और लोग संकीर्णताओं में सिमट रहे हैं।

रेलों की पटरियाँ आज भी पूछती हैं,
किसने इंसानों को मज़हब में तौला था?
किसकी ज़िद में सदियों का अपनापन
लाशों के बोझ तले डोला था?

आज भी दोनों ओर की धरती पर
नफ़रत की आँधी चलती है;
इस पार शाहिदा ख़ौफ़ में जीती है,
उस पार सरिता भी जलती है।

जिस सरज़मीं को लहू ने सींचा,
उसे मज़हब की फ़सलें क्या देंगी?
जब नफ़रत के बीज बोए जाएँगे,
तो आने वाली नस्लें क्या लेंगी?

क्या लिखूँ, किसके पक्ष में लिखूँ?
कलम भी काँपने लगी है आज;
सच कहना अब अपराध हुआ है,
झूठ पहनता फिरता है ताज।

बहुत बेचैनी होती है सोचकर,
क्या होगा मेरे इस देश का भला?
सच भी अब सहमा-सहमा फिरता है,
झूठ के पीछे चलता है काफ़िला।

लेकिन अभी कहानी बाक़ी है,
हर दिल की निगहबानी बाक़ी है;
नफ़रत चाहे जितनी तेज़ बहे,
इंसानियत की रवानी बाक़ी है।

आओ फिर से ऐसा भारत गढ़ें,
जहाँ हर दिल में सिर्फ़ प्यार हो;
नफ़रत हारे हर चौखट पर,
इंसानियत की ही जीत हर बार हो।


Wednesday, June 24, 2026

संबंधों की बंजर ज़मीन...

 


 कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,

कुछ लोग वफा करते ही नहीं।

अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,

तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।


अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,

पहले जैसे सँवरते ही नहीं।

जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,

वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।


इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,

अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।

एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,

अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।


क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही

बगिया को पानी से भरते ही नहीं।

अब राम-रहीम कभी एक राह से,

चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।


जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,

तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।

जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,

वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।


जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,

वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।

जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,

फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।


दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,

माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।

संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,

फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।



Monday, June 15, 2026

कॉकरोच का घोषणा पत्र..

बूढ़े और क्षीण विचारों को उखाड़ फेंके,
मैं वो नयी और ज्वलंत सोच हूँ,
इस सिस्टम के नस-नस में घुसकर बदलाव करूँगा,
मैं वो ईमानदार "कॉकरोच" हूँ।

अंधेरों की सीलन में भी जो
ज़िंदा रहने का साहस रखता है,
झूठे महलों की बुनियादों में
सच बनकर जो धँसता है।

ना सूटों की चमक से बिकता,
भाषण से भी बहलाया न जाने वाला आक्रोश हूँ,
तुम जिसको कीड़ा कहते फिरते "जज साहब" ,
मैं वही सवाल उठाता "कॉकरोच" हूँ।

तख़्तों के नीचे पलते डर को
दिन के उजाले में लाऊँगा,
जो खाते हैं जनता का हिस्सा
उनके चेहरे गिनवाऊँगा।

सत्ता के रसोड़े से उठता
गरीब जनता का बरसों का अफ़सोस हूँ,
उस बदबूदार व्यवस्था के आगे ना झुकने वाला,
मैं निडर अडिग "कॉकरोच" हूँ।

मैं नारा नहीं, चेतावनी हूँ,
सड़कों की सच्ची आह हूँ,
तुम्हारे बंद कमरों में घुसती
जनता की खुलती चाह हूँ।

अब डरना तुमको होगा साहब,
मैं जनता को जगाता हर रोज हूँ,
हर गली में, हर मोहल्ले में पलता,
मैं जिंदा खड़ा "कॉकरोच" हूँ।