Saturday, October 10, 2026

किसे आवाज़ देता...



किसे आवाज़ देता तुम बताओ.......? 

मेरी नैया मेरे साहिल से किनारा कर गई थी,
मेरे सपनों की दुनिया महामारी से गुजर गई थी।
कई अपनों ने छुरा घोंप दिया था पीठ पर मेरे,
कई लोगों की इंसानियत तड़पकर मर गई थी।

कहीं जालसाज़ी ने मेरे रिश्तों में घर किया था,
कई मेरे सपनों ने गरीबी में गुजर-बसर किया था।
तुम्हीं बताओ, किसके दर पे जाता, किसे पुकारता,
मेरा साया ही मेरे ख़्वाबों की दुनिया तबाह कर गया था।

कहीं संबंधों में नाराज़गी की अग्नि सुलग रही थी,
कभी मेरी ही साँसें बोझिल होकर थक रही थीं।
मेरी कलम भी बुरी बन गई थी सच्चाई लिख-लिखकर,
किसी की रचना चापलूसी के पन्नों से महक रही थी।

किसे दुखड़े सुनाता और किसे गले लगाता,
हम दोनों का ही मन एक-दूजे से भर गया था।
कहाँ चादर चढ़ाता और कहाँ धागे मैं बाँधता,
अपनी परेशानियों को लेकर मैं भटक दर-दर गया था।

किसे कहता, मेरी किश्ती को डूबने से बचा लो,
मैं बिगड़ी क़िस्मत और नौका लिए उतर समंदर गया था।
पकड़नी थी मुझे खोई रफ्तार और बिखरे सपने,
जिसे मेरी लापरवाही ही निगल बन भंवर गई थी। 

किसे आवाज़ देता, तुम बताओ...? 




Friday, September 25, 2026

अनगिनत सवाल अब भी हैं...



दिल को समझा लिया मगर मलाल अब भी है,
सब कुछ ख़त्म हो गया मगर ‘क्यों’ सवाल अब भी है।
सारी यादें, वादे और तोहफ़े जला आए हम कब के,
मगर उसका दिया पहला रुमाल अब भी है।

ये न कहना कि हमें ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा,
जिस्म तंदुरुस्त भले, दिल बेहाल अब भी है।
आईना भी पकड़ नहीं सकता सच हमारा,
लबों पे हँसी है मगर आँखें लाल अब भी हैं।

जो छोड़ गए थे, उन्हें कभी पलटकर हमने भी नहीं देखा,
किस तरह उस गली से हुए थे रुख़्सत, ख़याल अब भी है।
अब भी पाँव काँपते हैं वापस लौटने का सोचकर,
सारे फ़साद मिट गए मगर रूह पामाल अब भी है।

न मैं, न मेरे ज़ख़्म करेंगे कभी माफ़ तुम्हें,
नफ़रत के बाद भी न जाने क्यों मोह का जंजाल अब भी है।
हर रोज़ कुरेदा है ज़ख़्म, न भरने देने के लिए,
आत्मा मर चुकी है मगर लहू में उबाल अब भी है।

न तुम चाहिए, न तुम्हारी यादें चाहिए अब,
मगर पीठ पे चिपका यादों का बेताल अब भी है।
मैं ख़ुश हूँ जैसा हूँ, जहाँ भी हूँ अब,
क्या सच में ख़ुश हूँ—दिल में ये सवाल अब भी है?



Monday, September 14, 2026

मिट्टी कुरेदोगे तो अपने मिलेंगे..

 

गगन रोया तो मिट्टी की काया काँप उठी,
जड़ों में दफ़्न सदियों की माया काँप उठी।
बादल के फटने से ज़मीं खिसकी कुछ यूँ,
कि दरख़्तों संग पहाड़ की छाया काँप उठी।

जहाँ हरियाली कभी जीवन का उजाला था,
हर पगडंडी पर उम्मीदों का बोलबाला था।
मलबे में दफ़्न हो गईं गाँव की राहें सारी,
जिसने लौटता हर मुसाफ़िर को सम्भाला था।

ये चीड़ के दरख़्त जो आँधियों से लड़े थे,
पहाड़ के सीने पर पहरेदार बन खड़े थे।
आज जड़ों समेत ढलानों पर बहते हैं यूँ,
मानो अपने ही घर की चौखट से उखड़े थे।

जिस आँगन में कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी,
हर शाम जहाँ लौटकर ख़ुशी भी झूमती थी।
आज उसी चौखट पर सन्नाटा सोया है,
जहाँ माँ हर शाम आवाज लगाए घूमती थी।

कुदरत के आगे इंसान का हौसला टूट गया,
गाँव का वो पुराना हँसता मंज़र छूट गया।
तबाही लिख गई ज़मीन पर एक नया अफ़साना,
जिसे देख पल भर में अश्कों का सैलाब फूट गया।

पहाड़ आज भी खड़ा है, मगर ख़ामोश है,
सीने में न जाने कितने ज़ख़्मों का बोझ है।
वो रो नहीं सकता—उसकी आँखें पत्थर हैं,
मगर वो अपनों के लिए अब भी तड़पता रोज है।

कभी लौटकर देखना उस पहाड़ की आँखों में,
वहाँ सिर्फ़ पत्थर नहीं, कई सपने मिलेंगे।
कुछ रास्ते, कुछ घर, कुछ रिश्ते दबे होंगे,
मिट्टी कुरेदोगे तो शायद अपने मिलेंगे।