Saturday, February 21, 2026

जागीर-ए-अश्क...

 


आँसू वासू रोना-धोना, सब तेरे खातिर तो है,

ये आँखें भी मानो तेरी, गिरवी रखी जागीर तो हैं।

तू दिखे चाँद-सा निर्मल, आग सी मिलती ताहिर तो है 

तू लगता शरीफ लाख भले, दिमाग तेरा शातिर तो है।


तेरे लफ़्ज़ भले चाशनी से हों, घाव करे तो तीर से है 

हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।

तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है

मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।


तू पास नहीं एहसास है मुझे, पर प्यार जताने को तस्वीर तो है 

मैं रोऊँ तो बदरी छाए, दिल मे अब भी कोई पीर तो है 

यहाँ रांझा बदल गया बेमतलब, पर बाट जोहती हीर तो है।

तेरे नाम की तस्बीह फेरते-फेरते , रूह आज भी शब्बीर तो है ।


सांसो में ताले पड़ गए, मन अब भी बड़ा अधीर तो है 

शोहरत लाख बक्शी हो खुदा ने, दिल से तू फकीर तो है ।

एक दिन टूट जाएगा ये रिश्ता भी, सिर्फ माया का जंजीर तो है 

मैं हार के भी तुझे जीत कहूँ, अब भी खुदा मेरा नासीर तो है ।


जागीर = 'संपत्ति' या 'रियासत' 

ताहिर = 'पवित्र' या 'शुद्ध' 

तासीर = 'प्रभाव' या 'असर

पीर = दर्द या वेदना:  

शब्बीर = 'सुंदर', 'उत्तम चरित्र वाला' या 'नेक'

अधीर = 'धैर्यहीन' या 'बेचैन'

नासीर = 'मददगार' या 'सहायता करने वाला' |







Wednesday, December 31, 2025

अलविदा 2K25...





जा रहा है 2025

पीछे छोड़कर कुछ अधूरे ख़्वाब,

कुछ पूरे हुए वादे,

और ढेरों सबक—

जो वक़्त ने

ख़ामोशी से हथेली पर रख दिए।


इस साल ने

कभी हँसना सिखाया,

कभी आँसुओं से आँखें भर दीं,

कभी अपनों की अहमियत समझाई,

तो कभी भीड़ में

अकेले खड़े रहना।


अब दरवाज़े पर दस्तक हुयी है

2026 की—

नई धूप, नई राहें,

नए इरादों के साथ।

स्वागत है उस साल का

जो टूटे हौसलों को जोड़ दे,

थके क़दमों को

फिर चलना सिखा दे।


अलविदा 2025,

शुक्रिया हर दर्द, हर दुआ के लिए—

तूने जो छीना,

उससे ज़्यादा

हमें मज़बूत बनाकर दिया।


सुस्वागत 2026,

इतना सा वादा कर लेना—

कि इंसानियत ज़िंदा रहे,

सच की आवाज़ कमज़ोर न पड़े,

और मेहनत करने वाले हाथ

कभी खाली न लौटें।


एक नया सवेरा है,

एक नई उम्मीद के नाम—

स्वागत है 2026,

दिल खोलकर, पूरे सम्मान के साथ।

Happy New Year to All Of You.




Tuesday, December 23, 2025

कदर....




 


जब बंदर के हाथ लग जाए हल्दी,

या किसी को सबकुछ मिल जाए जल्दी—

तब कदर नहीं होती वक़्त की,

या घमंड कर देता चकनाचूर है।

यहाँ कोई हालातों का मारा,

तो कोई जीता जीवन भरपूर है।


जब अंधे के हाथ लग जाए बटेर,

या भिखारी के हाथ लग जाय धन का ढेर—

तब कदर नहीं होती मेहनत की,

समय भी खो देता अपना नूर है।

यहाँ कोई पानी-सा शीतल रहता,

किसी में आग-सा धधकता गुरूर है।


जब पूस की सर्दी में मिल जाए अलाव,

या बूढ़े जिस्म मे आ जाए ताव—

तब कदर नहीं रहती दाता की,

हर उम्र में इंसान कहीं न कहीं मगरूर है।

यहाँ कोई गैरों से भी होता बेहद करीब,

तो कोई अपनों से भी बहुत दूर है।


जब रणभूमि में मिल जाए संजीवनी,

या तरक्की हो दिन-दूनी रात-चौगुनी—

तब कदर नहीं रहती दवा और दुआ की,

जिंदगी में ऐसा समय भी आता ज़रूर है।

यहाँ कोई सोता शीशमहल के मखमली बिस्तर पर,

तो कोई रातों को जागने को भी मजबूर है।


जब प्यासे को मिल जाए दरिया का किनारा,

या किसी भटके राही को मिल जाए सहारा—

तब कदर नहीं रहती राहों की,

न मंज़िल का रहता कोई सुरूर है।

यहाँ कोई टूटकर भी मुस्कुराता रहता उम्रभर,

कोई सब पाकर भी भीतर से बिल्कुल चूर है।


जब खुशियाँ किसी के दामन में भर जाएँ पूरी,

या किसी के हिस्से आए बस तन्हाई और दूरी—

तब कदर नहीं होती सुकून की,

और हर ज़ख्म होता तब नासूर है।

यहाँ कोई अँधेरों में भी ढूंढ लेता है राह अपनी,

कोई रोशनी में रहकर भी बेनूर है।|