Sunday, August 2, 2026

"रीलों में सिमटी पीढ़ी"


स्क्रीन की चमक में खोए चेहरे,

आँखों में सपनों का शोर नहीं।

हर पल चाहिए ताली दुनिया की,

पर भीतर कोई ठौर नहीं।


लाइक्स की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,

रिश्तों का आँगन भूल गए।

सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,

फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।


शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,

ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।

मेहनत से जो रिश्ता टूटा,

शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।


हर असहमति बनती नफ़रत,

हर आलोचना अपमान लगे।

दर्पण भी दुश्मन लगता है,

यदि सच का कोई निशान मिले।


याद रखो, इतिहास वही लिखता,

जो पसीने से कलम चलाता है।

क्षणिक प्रसिद्धि धूल बन जाती,

उत्तम चरित्र ही युगों तक यश पाता है।


हर युवा ऐसा नहीं होता,

बहुत-से दीप अभी भी जलते हैं।

जो श्रम, संस्कार और सत्य के संग,

कल के भारत को आगे लेकर चलते हैं।


"यह कविता किसी पूरी पीढ़ी पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर प्रश्न है जो मेहनत से अधिक दिखावे, चरित्र से अधिक प्रसिद्धि और सत्य से अधिक ट्रेंड को महत्व देती है।"




 

Monday, July 27, 2026

एक ख़याल… जो मरने नहीं देता

 

कौन है जो मेरे हिस्से का रो देगा,
सारे गहरे ज़ख्मों का दर्द धो देगा।
मैं अब चोला बदलना चाह रहा हूँ मगर,
कौन मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा हो देगा।

मैं नाकामयाब रहा घर की ज़िम्मेदारी उठाने में,
कौन मेरे आँगन में खुशी के बीज बो देगा।
मत पूछो कैसी कट रही है ये निष्ठुर ज़िंदगी,
किसी ने गर हाल भी पूछा, तो बंदा रो देगा।

खुद साया भी मुझे सच का आईना दिखाता है,
मैं हर इम्तिहान के लिए तैयार हूँ, ख़ुदा जो देगा।
बहुत ऊब गया हूँ इस ज़िंदगी के ताने-बाने से,
कौन बिखरे हुए ख़्वाबों की माला को पिरो देगा।

मैंने अपना समझकर सारे हालात साँझा किए थे,
क्या मालूम था, एक दिन वही शख़्स डुबो देगा।
रिश्तों की लाज में ख़ामोश डूबता ही रहा,
ये बंदा जिस्म के साथ अपनी साँसें भी खो देगा।

मेरे जाने के बाद सिर्फ़ मेरे घर का कमरा ही सूना पड़ेगा,
जो मेरे अपनों की आँखों को आँसुओं से भिगो देगा।
दुनिया को क्या ही परवाह है मेरी और मेरे ख़्वाबों की,
वो मेरी तस्वीर को किसी दीवार पर माला से संजो देगा।

कदम ख़ुद खुशी के लिए भी बढ़ा चुका हूँ बहुत बार,
मगर मेरे जाने का दर्द कोई ताउम्र ढो देगा।
बस इसी सोच में कदम खींच लेता हूँ पीछे,
मेरे बाद मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा कोई नहीं हो देगा।



Thursday, July 16, 2026

बदली हुयी नस्लें...


 तुम्हारी हर तरक़्क़ी का वो जो आधार बैठे हैं,

तुम्हें अफ़सर बनाकर खुद तो बे-रोज़गार बैठे हैं।

तुम्हारी डिग्रियों ने बस तुम्हें ये अक़्ल बख़्शी है,

कि तुम ये सोच सको कि बूढ़े अब बेकार बैठे हैं।


तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,

कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?

जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,

तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।


कहाँ फुर्सत है तुमको जो बैठो दो घड़ी उनके पास,

तुम्हारी मोबाइल स्क्रीन पर ही तो बसती है दुनिया ख़ास।

वो ज़िंदा लाश बनकर घर के कोने में पड़े हैं,

तुम्हें शायद उन्हें खोने का बिल्कुल भी नहीं 'एहसास'।


वसीयत लिखवाते ही जो रंगत बदल जाती है तुम्हारी,

अचानक लगने लगती है बुज़ुर्गों की सेवा भारी।

तुम्हारी परवरिश का इससे बड़ा क्या सबूत होगा,

कि अब तुम 'केयर टेकर' के भरोसे छोड़ते हो ज़िम्मेदारी।


महीने की सैलरी से जो उनका ख़र्च बटता है,

तो ऐसा लगता है जैसे कोई टैक्स कटता है।

भूल गए कि तुम्हारी ज़िद पर उन्होंने ख़ून बेचा था,

आज एक सीरप की क़ीमत से तुम्हारा बैंक बैलेंस घटता है।


उन्होंने तो लहू देकर तुम्हें इंसान बनाया था,

शरीफ़ों की तरह जीने का इक अरमान सजाया था।

मगर तुमने ज़माने की हवा में खुद को यूँ बेचा,

कि वो भी सोच में हैं—क्या यही तुमको सिखाया था?


मुबारक हो तुम्हें ये न्यू-एज (New-age) की आज़ादी,

बुज़ुर्गों के तजुर्बों को जो कहती है सिर्फ़ बर्बादी।

मगर याद रखना—जो बो रहे हो, वही कल काटोगे,

तुम्हारी भी औलाद सीख रही है तुम्हारी ये उस्तादी।