Tuesday, August 18, 2026

तुम ही तो हो....


एक लड़की है...

जो हर पाँच मिनट में कुछ न कुछ भूल जाती है,

कभी फ़ोन कहाँ रखा, कभी चश्मा कहाँ छोड़ा,

कभी खुद ही पूछकर अपना सवाल तक भूल जाती है।


फिर मासूम-सा चेहरा बनाकर कहती है—

"अरे यार... मैं तो भूल गई!"

और दुनिया की सारी नाराज़गी

उस एक मुस्कान के आगे हार जाती है।


वो चुलबुली है,

जैसे तितलियों ने हवा को हँसना सिखाया हो।

उसकी बातें कभी पूरी नहीं होतीं,

लेकिन दिल हमेशा पूरा जीत लेती हैं।


उसकी शरारतें किसी को सताने के लिए नहीं,

हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।


वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।

वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।


उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,

पर एक ऐसा दिल है

जिसमें छल की जगह नहीं,

सिर्फ़ अपनापन रहता है।


शायद उसे आज तक ये एहसास भी नहीं हुआ,

कि उसकी हर "अरे, मैं भूल गई..."

किसी की सबसे प्यारी याद बन चुकी है।


और अगर...

ये कविता पढ़कर किसी लड़की के होंठों पर

बिना वजह मुस्कान आ जाए,

और वो मन ही मन कहे—

"ये तो बिल्कुल मेरी बात है..."


तो समझ जाना,

कविता ने अपना सही पता ढूँढ़ लिया है।




Tuesday, August 11, 2026

दोगलेपन पर तंज़

 



कैसे बेच देते हैं लोग चंद सिक्कों में ज़मीर को,
जहाँ फ़ायदा हो, वहीं झोंक देते हैं मोम-से शरीर को।

कल दिल्ली के आंदोलन के बच्चे दिख रहे थे सभी को,
आज झारखंड के बच्चे अकेले पार कर रहे शमशीर को।

जो 'दीप' बनकर रोशनी बाँटने का ढोंग रचाते रहे,
वो कैमरों की चमक में ही तलाशते हैं अपनी ताबीर को।

न मसनद के बाज़ीगर जागे, न विपक्ष के मौसमी रहनुमा,
सबने अपनी सहूलियत के तराज़ू में तोला है इस तस्वीर को।

जहाँ मंच मिला, जहाँ टीआरपी थी, वहाँ हमदर्दों का मेला था,
आज सन्नाटा साधे बैठे हैं, देखकर छात्रों की तक़दीर को।

इंसाफ़ भी अब चेहरे और भूगोल देखकर बाँटते हैं ये लोग,
कौन समझेगा इन बेबस और अनदेखे युवाओं की पीर को?

मगर याद रहे, जो अकेले रास्तों पर लड़ना जानते हैं,
वही कल बदलकर रख देंगे इतिहास की हर तहरीर को।

भूलेगा नहीं झारखंड का युवा दोगलेपन की इस तासीर को,
न्याय को मत बाँटो खण्डों में, खींचकर नफ़रत की लकीर को



Sunday, August 2, 2026

"रीलों में सिमटी पीढ़ी"


स्क्रीन की चमक में खोए चेहरे,

आँखों में सपनों का शोर नहीं।

हर पल चाहिए ताली दुनिया की,

पर भीतर कोई ठौर नहीं।


लाइक्स की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,

रिश्तों का आँगन भूल गए।

सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,

फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।


शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,

ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।

मेहनत से जो रिश्ता टूटा,

शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।


हर असहमति बनती नफ़रत,

हर आलोचना अपमान लगे।

दर्पण भी दुश्मन लगता है,

यदि सच का कोई निशान मिले।


याद रखो, इतिहास वही लिखता,

जो पसीने से कलम चलाता है।

क्षणिक प्रसिद्धि धूल बन जाती,

उत्तम चरित्र ही युगों तक यश पाता है।


हर युवा ऐसा नहीं होता,

बहुत-से दीप अभी भी जलते हैं।

जो श्रम, संस्कार और सत्य के संग,

कल के भारत को आगे लेकर चलते हैं।


"यह कविता किसी पूरी पीढ़ी पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर प्रश्न है जो मेहनत से अधिक दिखावे, चरित्र से अधिक प्रसिद्धि और सत्य से अधिक ट्रेंड को महत्व देती है।"