Friday, March 20, 2026

शक्ति का प्रचंड स्वर : जय माँ दुर्गा



जगजननी के चरणों में दीपक की लौ जलती है,
सिंहवाहिनी के रूप में शक्ति स्वयं चलती है।
भारतीय संस्कृति की धारा माँ के वंदन में बहती है,
जय श्री दुर्गा की जयकार से सम्पूर्ण सृष्टि संभलती है।

शंख बजें, मंदिर गूँजें, हर आँगन मंगलमय हो,
जप-तप और साधना से जीवन सदैव दैवमय हो।
हिन्दुत्व की आत्मा गाती — धर्म रहे, संस्कार रहें,
माँ दुर्गा के आशीर्वाद से सब दुःख मिटें, न कोई भय हो।

ढोल-नगाड़े गगन गूँजें, हर दिशा में मधुर तान बहे,
आरती की थाल सजे, भक्ति-सागर समान बहे।
सनातन की पहचान है माँ के चरणों में समर्पण,
सदियों से जो संस्कृति है, वही जीवन का ध्यान रहे।

सिंह-गर्जना सी शक्ति से जब माँ का आशीष मिले,
असुरों के पाप धधक उठें, धर्म की रक्षा फलित चले।
आस्था की ज्योति जलती रहे हर दीपक की लौ में,
हर मंदिर, हर आँगन में माँ दुर्गा स्वयं संग चले।

माँ का व्रत है साधना, माँ का स्मरण है प्राण,
माँ का ही रूप है भारत, माँ का ही है सम्मान।
सहस्रों वर्षों की गाथा से देवी-शक्ति का परचम लहराए,
जय श्री दुर्गा के उद्घोष से गूँजे हर स्थान।

जयकारा उठे गगन में, दीपक हर द्वार में जलें,
नवरात्रि के नौ दिन माँ के आशीष सदा फलें।
भक्ति की ज्योति प्रज्वलित रहे, हर मनुज के हृदय में,
जय माँ दुर्गा की जयकार से कभी न श्रद्धा का सूर्य ढले।





Saturday, February 21, 2026

जागीर-ए-अश्क...

 


आँसू वासू रोना-धोना, सब तेरे खातिर तो है,

ये आँखें भी मानो तेरी, गिरवी रखी जागीर तो हैं।

तू दिखे चाँद-सा निर्मल, आग सी मिलती ताहिर तो है 

तू लगता शरीफ लाख भले, दिमाग तेरा शातिर तो है।


तेरे लफ़्ज़ भले चाशनी से हों, घाव करे तो तीर से है 

हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।

तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है

मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।


तू पास नहीं एहसास है मुझे, पर प्यार जताने को तस्वीर तो है 

मैं रोऊँ तो बदरी छाए, दिल मे अब भी कोई पीर तो है 

यहाँ रांझा बदल गया बेमतलब, पर बाट जोहती हीर तो है।

तेरे नाम की तस्बीह फेरते-फेरते , रूह आज भी शब्बीर तो है ।


सांसो में ताले पड़ गए, मन अब भी बड़ा अधीर तो है 

शोहरत लाख बक्शी हो खुदा ने, दिल से तू फकीर तो है ।

एक दिन टूट जाएगा ये रिश्ता भी, सिर्फ माया का जंजीर तो है 

मैं हार के भी तुझे जीत कहूँ, अब भी खुदा मेरा नासीर तो है ।


जागीर = 'संपत्ति' या 'रियासत' 

ताहिर = 'पवित्र' या 'शुद्ध' 

तासीर = 'प्रभाव' या 'असर

पीर = दर्द या वेदना:  

शब्बीर = 'सुंदर', 'उत्तम चरित्र वाला' या 'नेक'

अधीर = 'धैर्यहीन' या 'बेचैन'

नासीर = 'मददगार' या 'सहायता करने वाला' |







Wednesday, December 31, 2025

अलविदा 2K25...





जा रहा है 2025

पीछे छोड़कर कुछ अधूरे ख़्वाब,

कुछ पूरे हुए वादे,

और ढेरों सबक—

जो वक़्त ने

ख़ामोशी से हथेली पर रख दिए।


इस साल ने

कभी हँसना सिखाया,

कभी आँसुओं से आँखें भर दीं,

कभी अपनों की अहमियत समझाई,

तो कभी भीड़ में

अकेले खड़े रहना।


अब दरवाज़े पर दस्तक हुयी है

2026 की—

नई धूप, नई राहें,

नए इरादों के साथ।

स्वागत है उस साल का

जो टूटे हौसलों को जोड़ दे,

थके क़दमों को

फिर चलना सिखा दे।


अलविदा 2025,

शुक्रिया हर दर्द, हर दुआ के लिए—

तूने जो छीना,

उससे ज़्यादा

हमें मज़बूत बनाकर दिया।


सुस्वागत 2026,

इतना सा वादा कर लेना—

कि इंसानियत ज़िंदा रहे,

सच की आवाज़ कमज़ोर न पड़े,

और मेहनत करने वाले हाथ

कभी खाली न लौटें।


एक नया सवेरा है,

एक नई उम्मीद के नाम—

स्वागत है 2026,

दिल खोलकर, पूरे सम्मान के साथ।

Happy New Year to All Of You.