Monday, July 27, 2026

एक ख़याल… जो मरने नहीं देता

 

कौन है जो मेरे हिस्से का रो देगा,
सारे गहरे ज़ख्मों का दर्द धो देगा।
मैं अब चोला बदलना चाह रहा हूँ मगर,
कौन मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा हो देगा।

मैं नाकामयाब रहा घर की ज़िम्मेदारी उठाने में,
कौन मेरे आँगन में खुशी के बीज बो देगा।
मत पूछो कैसी कट रही है ये निष्ठुर ज़िंदगी,
किसी ने गर हाल भी पूछा, तो बंदा रो देगा।

खुद साया भी मुझे सच का आईना दिखाता है,
मैं हर इम्तिहान के लिए तैयार हूँ, ख़ुदा जो देगा।
बहुत ऊब गया हूँ इस ज़िंदगी के ताने-बाने से,
कौन बिखरे हुए ख़्वाबों की माला को पिरो देगा।

मैंने अपना समझकर सारे हालात साँझा किए थे,
क्या मालूम था, एक दिन वही शख़्स डुबो देगा।
रिश्तों की लाज में ख़ामोश डूबता ही रहा,
ये बंदा जिस्म के साथ अपनी साँसें भी खो देगा।

मेरे जाने के बाद सिर्फ़ मेरे घर का कमरा ही सूना पड़ेगा,
जो मेरे अपनों की आँखों को आँसुओं से भिगो देगा।
दुनिया को क्या ही परवाह है मेरी और मेरे ख़्वाबों की,
वो मेरी तस्वीर को किसी दीवार पर माला से संजो देगा।

कदम ख़ुद खुशी के लिए भी बढ़ा चुका हूँ बहुत बार,
मगर मेरे जाने का दर्द कोई ताउम्र ढो देगा।
बस इसी सोच में कदम खींच लेता हूँ पीछे,
मेरे बाद मेरे अपनों के लिए मेरे जैसा कोई नहीं हो देगा।



Thursday, July 16, 2026

बदली हुयी नस्लें...


 तुम्हारी हर तरक़्क़ी का वो जो आधार बैठे हैं,

तुम्हें अफ़सर बनाकर खुद तो बे-रोज़गार बैठे हैं।

तुम्हारी डिग्रियों ने बस तुम्हें ये अक़्ल बख़्शी है,

कि तुम ये सोच सको कि बूढ़े अब बेकार बैठे हैं।


तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,

कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?

जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,

तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।


कहाँ फुर्सत है तुमको जो बैठो दो घड़ी उनके पास,

तुम्हारी मोबाइल स्क्रीन पर ही तो बसती है दुनिया ख़ास।

वो ज़िंदा लाश बनकर घर के कोने में पड़े हैं,

तुम्हें शायद उन्हें खोने का बिल्कुल भी नहीं 'एहसास'।


वसीयत लिखवाते ही जो रंगत बदल जाती है तुम्हारी,

अचानक लगने लगती है बुज़ुर्गों की सेवा भारी।

तुम्हारी परवरिश का इससे बड़ा क्या सबूत होगा,

कि अब तुम 'केयर टेकर' के भरोसे छोड़ते हो ज़िम्मेदारी।


महीने की सैलरी से जो उनका ख़र्च बटता है,

तो ऐसा लगता है जैसे कोई टैक्स कटता है।

भूल गए कि तुम्हारी ज़िद पर उन्होंने ख़ून बेचा था,

आज एक सीरप की क़ीमत से तुम्हारा बैंक बैलेंस घटता है।


उन्होंने तो लहू देकर तुम्हें इंसान बनाया था,

शरीफ़ों की तरह जीने का इक अरमान सजाया था।

मगर तुमने ज़माने की हवा में खुद को यूँ बेचा,

कि वो भी सोच में हैं—क्या यही तुमको सिखाया था?


मुबारक हो तुम्हें ये न्यू-एज (New-age) की आज़ादी,

बुज़ुर्गों के तजुर्बों को जो कहती है सिर्फ़ बर्बादी।

मगर याद रखना—जो बो रहे हो, वही कल काटोगे,

तुम्हारी भी औलाद सीख रही है तुम्हारी ये उस्तादी।




Monday, July 6, 2026

अभी इंसानियत बांकी है..


ये देश सौहार्द और प्रेम का था,
फिर किसने नफ़रत में बाँट दिया?
क्यों तौफ़ीक़ मारा गया मुठभेड़ में,
क्यों सूर्या को बेरहमी से काट दिया?

जिस भाईचारे की ख़ातिर बापू ने
राम और रहीम को गले लगाया,
फिर क्यों नफ़रत के सौदागरों ने
हर आँगन में ज़हर फैलाया?

क्या इतिहास की वही दरारें
आज भी दिलों में पलती हैं?
क्यों हर दौर की अंधी सियासतें
इंसानियत को छलती हैं?

धर्म के नाम पर इंसान कट रहे हैं,
जाति के नाम पर रिश्ते बँट रहे हैं;
संविधान अलमारियों में क़ैद पड़ा है,
और लोग संकीर्णताओं में सिमट रहे हैं।

रेलों की पटरियाँ आज भी पूछती हैं,
किसने इंसानों को मज़हब में तौला था?
किसकी ज़िद में सदियों का अपनापन
लाशों के बोझ तले डोला था?

आज भी दोनों ओर की धरती पर
नफ़रत की आँधी चलती है;
इस पार शाहिदा ख़ौफ़ में जीती है,
उस पार सरिता भी जलती है।

जिस सरज़मीं को लहू ने सींचा,
उसे मज़हब की फ़सलें क्या देंगी?
जब नफ़रत के बीज बोए जाएँगे,
तो आने वाली नस्लें क्या लेंगी?

क्या लिखूँ, किसके पक्ष में लिखूँ?
कलम भी काँपने लगी है आज;
सच कहना अब अपराध हुआ है,
झूठ पहनता फिरता है ताज।

बहुत बेचैनी होती है सोचकर,
क्या होगा मेरे इस देश का भला?
सच भी अब सहमा-सहमा फिरता है,
झूठ के पीछे चलता है काफ़िला।

लेकिन अभी कहानी बाक़ी है,
हर दिल की निगहबानी बाक़ी है;
नफ़रत चाहे जितनी तेज़ बहे,
इंसानियत की रवानी बाक़ी है।

आओ फिर से ऐसा भारत गढ़ें,
जहाँ हर दिल में सिर्फ़ प्यार हो;
नफ़रत हारे हर चौखट पर,
इंसानियत की ही जीत हर बार हो।