निकट भविष्य के श्रम-संघर्ष से,
तुम बिल्कुल ही अनजान हो।
या स्वयं को समझो पूर्ण समर्थ,
या चंद दिवस के मेहमान हो।
भूतकाल का अनुभव पथदर्शक,
वर्तमान कठिन या आसान हो।
मगर भविष्य कब ठहरा है,
सुनने जग के बखान को।
किसने बाँधा है समय को,
किसकी मुट्ठी में जहान हो।
पल भर में ताज बदल जाते,
क्या राजा और क्या दरबान हो।
न तुम संतुष्ट अपने आज से,
न बीते कल से परेशान हो।
आने वाले कल की चिंता में,
क्या खो रहे हो, अज्ञान हो।
सदैव समय एक-सा कब रहता,
चाहे मखमली धूप या तूफान हो।
ऋतु बदलें, मौसम बदलें,
खुशियों का या ग़म का सामान हो।
जो आज खड़ा है शिखरों पर,
कल धूल में उसकी पहचान हो।
और जो आज अंधेरों में भटके,
कल उसके हाथों में आसमान हो।
कल तो काल का कालचक्र है,
इस सत्य का सबको ज्ञान हो।
बस पुरुषार्थ के धर्म-पथ पर,
न किसी को दुःख, न अपमान हो।
कर्मों से ही कल सँवरता है,
न व्यर्थ किसी का अभिमान हो।
मानवता की ज्योति जलाए रखना,
यही जीवन का सम्मान हो।
