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Tuesday, February 18, 2025

सच बेकार नहीं होता......

 


बिन शब्दों के कभी कोई
भाव विस्तार नहीं होता,
जैसे बिन खेवनहार के
भवसागर पार नहीं होता।

ऊँचा कुल या ऊँची पदवी
सम्मान का आधार नहीं होता,
गाँठ पड़ी हो रिश्तों में तो
पूर्ण अधिकार नहीं होता।

झूठ, फरेब और लालच का
सदैव जय-जयकार नहीं होता,
सच कष्टदायी भले लगे
मगर परिणाम बेकार नहीं होता।

मन दुःखी और तन पीड़ित हो
फिर कोई श्रृंगार नहीं होता,
छलिया कितना भी शातिर हो
उसका हर वार नहीं होता।

पहली ठोकर जो सीख दे दे
फिर वैसा प्रहार नहीं होता,
मात मिली हो जिस रिश्ते से
उस पर मन तैयार नहीं होता।

कवि की कपोल-कल्पनाओं में
हरदम सत्य का सार नहीं होता,
जो कुछ लिखा हो कोरे कागज़ पर
वैसा ही संसार नहीं होता।

हर चमकती चीज़ जगत में
सोने का भंडार नहीं होता,
चेहरों से पहचान हो जाए
इतना सरल किरदार नहीं होता।

मौन बहुत कुछ कह जाता है
हर उत्तर शब्दों का मोहताज नहीं होता,
जिसके मन में प्रेम बसा हो
वह कभी सचमुच लाचार नहीं होता।

कवि हरीश भ्यूंलवी कहता है,
हर सपना साकार नहीं होता,
लेकिन जो सच की राह चले
उसका जीवन बेकार नहीं होता।।



Thursday, March 11, 2021

कागज कलम और एक शांत कोना...



धरती नाप ली नापने को,
अंतरिक्ष में आसमान बहुत हैं।
“पंख” थोड़े कमजोर पड़ गए,
हौसलों में अब भी उड़ान बहुत हैं।

चापलूसी से जीतेंगे जग को,
सोचने वाले नादान बहुत हैं।
खुद को अमर समझने वाले,
भूल गए कि श्मशान बहुत हैं।

मन, वचन और कर्म से ऊँचे,
दुनिया में अब भी इंसान बहुत हैं।
सब कुछ बख्शा है खुदा ने,
फिर भी बन्दे हैरान बहुत हैं।

लाखों की माया है फिर भी,
दिल में दबे अरमान बहुत हैं।
पत्थर को दर्जा दिया खुदा का,
खुले घूमते शैतान बहुत हैं।

कागज़, कलम और शांत-सा कोना,
लिखने को पूरा जहान बहुत है।
दुआएँ अपनों की रहती हैं संग,
फिर भी “हैरी” परेशान बहुत है।