मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।
तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।
मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।
सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।
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Friday, December 5, 2025
उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)
Saturday, May 8, 2021
"हाँ मैं एक मजदूर हूँ"
घर छोड़ा,परिवार छोड़ा,
छोड़ के अपने गाँव को
भाई बहिनों का साथ छोड़ा और
उस पीपल की छाँव को
माँ के हाथ का खाना छोड़
हर खुशी को तरसता जरूर हूँ
हाँ, मैं एक मजदूर हूँ....
चंद रुपया कमाने के खातिर
और भरपेट खाने को
बहुत पीछे छोड़ आया हूँ
अपने खुशियों के जमाने को
कुछ कमाने तो लग गया हूँ मगर
घर से बहुत दूर हूँ
हाँ, मैं एक मजदूर हूँ...
किसको अच्छा लगता है साहब
अपनों से बिछड़ने मे
मीलों दूर परदेश मे रहकर
खुद ही किस्मत से लड़ने में
कहीं हालातों का मारा हूँ
कभी भूख से मजबूर हूँ
हाँ, मैं एक मजदूर हूँ...
बेहद बेबस कर देती है,
भूख मुझसे बेचारों को
वरना दूर कभी न भेजती
माँ अपनी आंखों के तारों को
हारा नहीं हूँ अभी भी मैं
हौसले से भरपूर हूँ
कई दिनो का भूखा प्यासा
हाँ, मैं एक मजदूर हूँ....
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