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Saturday, April 6, 2024

तन खा गई तनख्वाह...



 
तन खा गई तनख्वाह मेरी
वेतन बेवतन कर गई
अस्थायी सी नौकरी मेरी
ना जाने कितने सितम कर गई

समय की परवाह बिना
चाकी सा पिसता रहता हूं
वक्त से तालमेल बिठाने को
बेवक्त घिसता रहता हूं

लहू में भी घुल रहीं
संघर्षों की अदृश्य गोलियाँ
ढल रहा फिरंगी रंग में
भूल गया अपनी भाषा-बोलियाँ

फिर भी कम लगती है उनको
मेरी मेहनत-मजदूरियाँ
सल्फास की गोलियाँ रखी हैं मगर
खाने नहीं देती मजबूरियाँ

नन्ही उम्र में ही छोड़ आए थे
गाँव की चौपाल सब 
अजनबी समझने लगे हैं
अपने ही बाल-गोपाल अब

कमाई ने बस “कम-आय” दी
सपनों पर संकट छा गई
अब किससे जा के कहूँ ‘जनाब’
तनख्वाह मेरी तन खा गई ।