Tuesday, April 14, 2026

मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में… (एक अधूरी आवाज़ की पूरी कहानी)


मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
जहाँ रिश्ते कागज़ पर तय होते हैं,
और दिलों की धड़कनें
चुपचाप समझौते ढोती हैं।

मैं वही लड़की हूँ…
जिसे वक़्त ने सवाल बनाकर छोड़ दिया,
जिसकी हँसी को धोखे ने
धीरे-धीरे खामोश कर दिया।

कहते हैं — “बेटी, अब भूल जाओ…”
पर क्या टूटे भरोसे भी
इतनी आसानी से जुड़ जाते हैं?
क्या आँखों में जमे हुए डर
बस रस्मों से धुल जाते हैं?

कम सुनाई देता है मुझे…
हाँ, ये दुनियाँ के शोर शराबे.... 
पर मैं हर वो चीख़ सुनती हूँ
जो मेरे भीतर रोज़ मरती है।

हर वो सिसकी महसूस करती हूँ
जो मेरी चुप्पी में पलती है।
तुम्हारे रीति-रिवाज़
मेरे घावों पर मरहम नहीं,
बल्कि नमक बनकर गिरते हैं,
जहाँ “समाज” की इज़्ज़त के नाम पर
मेरे सपने हर रोज़ मरते हैं।

मैं नहीं बढ़ूँगी उस राह पर
जहाँ मेरी आवाज़ को
“लड़की की ज़िद” कहकर दबा दिया जाए,
जहाँ मेरा डर भी
“समझदारी” में बदल दिया जाए।

मैं थकी हूँ…
पर टूटी नहीं हूँ अभी,
मैं चुप हूँ…
पर झुकी नहीं हूँ अभी।

मेरे कान भले अनसुना कर दे,
पर मेरी रूह अब साफ़ सुनती है—
मेरे खिलाफ रची गई हर साजिश को.. 

इसलिए मैं कहती हूँ—
मैं नहीं बधूंगी इस गठबंधन में,
मैं अपने टूटे हिस्सों को
खुद ही जोड़ लूँगी,
पर किसी और के नाम पर
खुद को फिर से नहीं तोड़ूँगी।







8 comments:

  1. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया गुरुजी 🙏

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  2. यह रचना सिर्फ शब्दों का संग्रह, नहीं बल्कि एक मजबूत सोच का प्रदर्शन है 🙏

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  3. अच्छा कवि,अच्छा लेखक होने के लिए पहले उसका एक संवेदनशील व्यक्ति होना अनिवार्य शर्त है। इसके अभाव में वह लिख तो सकता है लेकिन कितना सही लिखेगा, यह नहीं कहा जा सकता। आपकी कविता आपको अच्छे कवि की ओर बढ़ा रही है।
    प्रस्तुत कविता की नायिका एक निराश हताश लड़की है जो जीवन की उधेड़बुन से परेशान और थोड़ा थकी हुई है। उसकी पीड़ा और भावों को अच्छा उकेरा है।अच्छी बात यह है कि कवि ने उसे हताश बेबस नहीं रहने दिया उसे सशक्त लड़की के रूप में अंकित किया है यानि नायिका निराश है, हताश है ,बेबस भी है लेकिन बावजूद इसके वह हार नहीं मानती। वह अपनी इच्छा के विपरीत समझौता करने को तैयार नहीं है। वह समाज और परिवार से नजरें मिलाकर प्रश्न कर रही है और अपने जीवन संबंधी निर्णय खुद ले रही है । यह बेहद सकारात्मक पहलू है।

    सरल शब्दों में आपने स्त्री मन की पीड़ा को बहुत करीब से समझा। न केवल समझा वरन् उसे अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने समाज के लिए अपने हृदय से समझौते न करने के लिए उत्साहित भी किया है। यह वाकई सराहनीय है।
    वैसे पूरी कविता अच्छी है लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से नायिका के अपनी पीड़ा से उठकर आत्मविश्वास दर्शाती इन पंक्तियों ने विशेष आकृष्ट किया –
    “मैं थकी हूँ…
    पर टूटी नहीं हूँ अभी,
    मैं चुप हूँ…
    पर झुकी नहीं हूँ अभी।"

    कुल मिलाकर बहुत अच्छा लिख रहे हैं आप। लिखते रहिए। 👏🏻👏🏻👏🏻

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