आज हिसाब मांग रहीं हैं
मजबूरियों की फटी चादर से
परेशानियां झरोखों से झाँक रही हैं
कल के गुज़रे दिन सुहाने
आज जी का जंजाल बन रहीं हैं
कष्ट भरे इस अनचाहे सफर मे
दुखों से जिंदगी की ठन रही है
नाकामयाबी का सैलाब उठता हर रोज
मुश्किलों की आँधी उड़ा ले जाती खुशियों को
चंद बूँदों के लिए तरसती रेगिस्तान सी जिंदगी
फिर क्यूँ पहाड़ सी उम्र दे दी मनुष्यों को
भला होता चार लम्हा जीते मगर सुकून से
इन ग़मों के तूफान से टकराना ना होता
महलों के बजाय रहते बीहड़ो मे ही मगर
अनगिनत आशाओं के तले दबकर मर जाना ना होता ||
जागृत होते हैं रस, छंद, अलंकार और चौपाई
फिर तुकांत मिलाने को
शब्दों मे होती है लड़ाई
भाव उमड़ते हैं हर रस के
करुण, रौद्र, वीर और सहाय
छंदो का करके उचित प्रबंध
कवियों ने काव्य की अलख जगाए
चौपाई का हर एक चरण ही
मात्राओं का बनता नियत निकाय
अलंकार का सही शब्द नियोजन
कविता मे मिठास का रस भर जाय
कभी उपमा से कोयला भी बनता चांद
कभी हास्य रस गुदगुदी लगाए
कभी रौद्र रस क्रोध की ज्वाला भर दे
कभी करुण रस अश्कों से अश्रु बहाए
कितना सुंदर होता है ये समायोजन
जो हृदय मे प्रसन्न्ता भर देती है
एक कवि की बोल उठती है कल्पना
तब कविता जन्म लेती है ||