बनाया था जो मैंने सपनों का महल ढह गया
मैं गैर था उसके लिए गैर ही रह गया
बहुत जद्दोजहद की उसे पाने को लकीरो से
दिल ऐसा टूटा लहू आँखों से बह गया
मेरे ख्वाब याद सांसो तक मे समाया था वो..
पल भर में ही बेवजह अलविदा कह गया
लड़ रहा था खुदा तक से भी जिसे पाने के लिए
खुदा कसम उसी के लिए सबकुछ चुपचाप सह गया
कड़वी मगर एक सच्चाई से वाकिफ कर गया वो
वर्षों तक वफा की थी मैंने और अकेला रह गया
मैं गैर था उसके लिए गैर ही रह गया.....