Friday, February 18, 2022

लहू के दो रंग


 अब भी लहू के दो रंग, 

दिखते है मुझे इंसान मे

अब भी साजिश में शामिल गोडसे, 

कुछ अब भी शामिल गाँधी की हिंसा मे 


कुछ के ईश्वर हैं बापू,

कुछ गोडसे को सलामी देते हैं

ये मिली जुली सी फितरत लोगों की,

दोनों को बदनामी देते हैं 


ना गांधी ने कोई अनर्थ किया था,

ना गोडसे ने कद्दू मे तीर चलाया था

एक था अपनों के विश्वासघात का मारा,

एक को अपनों ने बरगलाया था 


एक नाम विश्व पटल पे था

एक का अपना ही संसार था

एक हिन्दू मुस्लिम मे भेद समझता,

एक का पूरा अपना परिवार था


अब कौन सही था कौन गलत

इस मुद्दे पर अलग अलग राय है

कोई कहता हिन्दू मुस्लिम हैं दुश्मन

कोई कहता भाई भाई हैं


गांधी ने मझधार मे छोड़कर

देश का बंटवारा होने दिया

गोडसे की गोली ने धधकती ज्वाला को

सुषुप्त अवस्था मे ही सोने दिया


अब किसके पक्ष मे खड़ा रहूं मैं

किसके खिलाफ कहूँ जंग है

अंतरात्मा तभी है कहती मेरी

अब भी लहू के दो रंग हैं 

8 comments:

  1. Its a very humble and daramartic voice of poerty and the free version are too good ....great going hari god bless u

    ReplyDelete
  2. ना गांधी ने कोई अनर्थ किया था,
    ना गोडसे ने कद्दू मे तीर चलाया था
    एक था अपनों के विश्वासघात का मारा,
    एक को अपनों ने बरगलाया था
    बेहतरीन सृजन....

    ReplyDelete
  3. लहू का एक ही रँग है ... अर इंसान का मन कुछ भी सोचने को स्वतंत्र है ... और रहना भी चाहिए ...

    ReplyDelete
  4. गाँधी जी की हत्या गोडसे ने किस मनस्थिति में की?कौन सही कौन गलत,अक्सर संवेदनशील लोग इसी ऊहापोह में लगे रह्ते हैं।एक अलग मिजाज की रचना प्रिय हरीश।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जिनता मैं समझ पाया दोनों को बस उन्हीं बिंदुओं को ध्यान मे रखकर लिखने की कोशिश की है mam बांकी कौन सही था कौन गलत उसका सही सही पता लगा पाना बहुत कठिन है

      Delete