तुम्हारी हर तरक़्क़ी का वो जो आधार बैठे हैं,
तुम्हें अफ़सर बनाकर खुद तो बे-रोज़गार बैठे हैं।
तुम्हारी डिग्रियों ने बस तुम्हें ये अक़्ल बख़्शी है,
कि तुम ये सोच सको कि बूढ़े अब बेकार बैठे हैं।
तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,
कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?
जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,
तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।
कहाँ फुर्सत है तुमको जो बैठो दो घड़ी उनके पास,
तुम्हारी मोबाइल स्क्रीन पर ही तो बसती है दुनिया ख़ास।
वो ज़िंदा लाश बनकर घर के कोने में पड़े हैं,
तुम्हें शायद उन्हें खोने का बिल्कुल भी नहीं 'एहसास'।
वसीयत लिखवाते ही जो रंगत बदल जाती है तुम्हारी,
अचानक लगने लगती है बुज़ुर्गों की सेवा भारी।
तुम्हारी परवरिश का इससे बड़ा क्या सबूत होगा,
कि अब तुम 'केयर टेकर' के भरोसे छोड़ते हो ज़िम्मेदारी।
महीने की सैलरी से जो उनका ख़र्च बटता है,
तो ऐसा लगता है जैसे कोई टैक्स कटता है।
भूल गए कि तुम्हारी ज़िद पर उन्होंने ख़ून बेचा था,
आज एक सीरप की क़ीमत से तुम्हारा बैंक बैलेंस घटता है।
उन्होंने तो लहू देकर तुम्हें इंसान बनाया था,
शरीफ़ों की तरह जीने का इक अरमान सजाया था।
मगर तुमने ज़माने की हवा में खुद को यूँ बेचा,
कि वो भी सोच में हैं—क्या यही तुमको सिखाया था?
मुबारक हो तुम्हें ये न्यू-एज (New-age) की आज़ादी,
बुज़ुर्गों के तजुर्बों को जो कहती है सिर्फ़ बर्बादी।
मगर याद रखना—जो बो रहे हो, वही कल काटोगे,
तुम्हारी भी औलाद सीख रही है तुम्हारी ये उस्तादी।

Nice poetry 💯💯
ReplyDeleteThanks you so much
Deleteजो बो रहे हो, वही कल काटोगे
ReplyDeleteयही सत्य है
शुक्रिया
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