जब मैं मरूँ और मेरा जनाज़ा निकाला जा रहा हो,
यह न समझना कि मैं इस दुनिया को याद कर रहा हूँ।
कोई अश्क न बहाए, कोई शोक न करे,
न कोई अपना मन भारी करे।
मैं किसी अंधकार में नहीं खो रहा हूँ,
मैं तो एक नए उजाले की ओर बढ़ रहा हूँ।
जब देखो मेरा जनाज़ा जाते हुए,
पीड़ा से व्याकुल होकर रोना नहीं।
मैं अलविदा नहीं कह रहा हूँ,
मैं तो शाश्वत प्रेम से मिल रहा हूँ।
मुझे मेरी कब्र में छोड़ आओ, तो अलविदा मत कहना,
याद रखना, कब्र जन्नत तक जाने वाला एक पर्दा मात्र है।
तुमने मुझे पंचतत्व में विलीन होते देखा है,
अब उसी से पुनः जीवन लेते भी देखना।
प्रकृति का अंत कैसे हो सकता है?
नहीं, वह कभी समाप्त नहीं होती।
मरण सूर्यास्त-सा प्रतीत अवश्य होता है,
किन्तु वास्तव में वह एक नई भोर है।
गोधूलि और प्रभात में सूर्य का अंत नहीं होता,
वह बस एक क्षितिज से दूसरे क्षितिज की यात्रा करता है।
जब मिट्टी तुम्हें अपने भीतर समेट लेती है,
तब आत्मा बंधनों से मुक्त हो जाती है।
क्या तुमने कभी किसी बीज को
धरती में समाकर नवांकुर बनते नहीं देखा?
फिर मनुष्य के पुनर्जन्म पर संशय कैसा?
अंत नहीं होता प्रकृति का,
वह तो हर मृत्यु में नया जीवन बोती है।
