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Thursday, July 24, 2025

मुफ़लिसी के साए में...



कौड़ियों के दाम जब बिक रहे जज़्बात गर,
क़ैदख़ाना-सा लगे जब अपना ही हो घर।
फिर किस मक़ाम जाकर मिले कतरा-ए-सुकूँ,
जब आँख मूँदते ही सताए मुस्तक़बिल का डर।

जब बिन विषधर के ज़ुबाँ उगलने लगे ज़हर,
लफ़्ज़ बन जाएँ तीर, और हर ढाल बेअसर।
फिर क्यों न बिखरे कोई, ख़िज़ाँ के पत्तों-सा,
जब जिस्म बेच फिर भी न जले चूल्हा-ए-घर।

मजबूरियों का फंदा तब घोंटता है साँस को,
जब झूठ का शोर दबा दे सच की आवाज़ को।
कौन करता है यूँ ही ख़्वाहिशों का तर्पण,
कुछ तो बाँध रहा होगा हौसलों की परवाज़ को।

किसका करता है दिल तर्क इस जहान को,
मुफ़लिसी लूट लेती है ख़्वाब और अरमान को।
जब रूह में हर घड़ी सुलगती रहे बेचैनी,
तो मौत भी लगे राहत फिर थके इंसान को।