Saturday, June 7, 2025
मैं धरती हूँ.....
Tuesday, May 27, 2025
दुनिया जालिम है....
दुनिया ज़ालिम है —
ये कोई शायर की शेख़ी नहीं,
बल्कि रोज़ सुबह की ख़बर है,
जिसे अख़बार भी छापते-छापते थक चुका है।
यहां आँसू ट्रेंड नहीं करते,
दर्द को 'डिज़ाइन' किया जाता है,
और सच्चाई?
वो तो शायद किसी पुरानी किताब के पन्नों में
धूल फाँक रही है।
यहां रिश्ते
व्हाट्सऐप के आख़िरी देखे गए समय जितने सच्चे हैं,
और भरोसा —
पासवर्ड की तरह, हर महीने बदलता रहता है।
बच्चे सपनों में खिलौने नहीं,
रखते हैं नौकरी की चिंता,
और बूढ़े,
यादों की गर्मी में ज़िंदा रहने की कोशिश करते हैं।
दुनिया ज़ालिम है,
क्योंकि यहां सवाल पूछना गुनाह है,
और खामोशी —
इंसान की सबसे क़ीमती पूंजी।
पर फिर भी,
हम हर सुबह उठते हैं,
चेहरे पे उम्मीद का मास्क लगाते हैं,
और चल पड़ते हैं —
इस ज़ालिम दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश में।|
Saturday, April 12, 2025
तुम वो महामहिम बनो....
तुम राम बनो, रहीम बनो,
इस देश के महामहिम बनो,
और तौल सको जो धर्म-अधर्म को,
तुम वो आधुनिक मशीन बनो...
सत्ता का तुमको गर्व न हो,
ना सिर्फ जीत की अभिलाषा हो,
तुमसे भय हो हर सशक्त को,
पर तुमसे हर गरीब को आशा हो।
तेरे बल से तू जग को जीते,
पर कर्मनिष्ठ हो युधिष्ठिर जैसा,
जब बात न्याय-धर्म की आए,
निर्णय में अपना-पराया कैसा।
जैसे भेद न करता सूर्य
राजा और रंक में,
जैसे शीतलता देना प्रकृति है
कोसों मील विचरते मयंक में।
तू भी अपना धर्म निभाना,
चाहे वजह ज़ोरू या ज़मीन हो,
तुम हो प्रधान सेवक जनमानस के,
चाहे ओहदे से महामहिम हो।
जय हिन्द।
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मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ इस बात से खुद भी बेजार हूँ मैं किसी के लिए बेशकीमती किसी के लिए बेकार हूँ समझ सका जो अब तक मुझको कायल मेरी छवि का...
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क्यों अपना ही घर हमें, छोड़कर भागना पड़ा हुक्मरान थे नींद में, हमें जागना पड़ा पुस्तैनी ज़मीं छोड़ी, सपनों का मकाँ गया किलकारियों से गूँजता,...



