Friday, March 14, 2025

शिक्षा : जीवन का आधार



 तुम हो चंचल, तुम हो ढीठ,
आलस ने बाँधी मन की रीढ़।
लाख समझाया फिर भी तुम,
दोहराते हो भूलें अतीत।

ना गुरुजी की डाँट का भय,
ना अपमान का कोई संशय।
हरदम दण्ड की पंक्ति में खड़े,
फिर क्यों न चुनते हो सत्पथ नय।

शिक्षा तुमको लगती बोझ,
मजबूरी में ढोते बस्ते रोज।
बेमन से पाया गया जो ज्ञान,
जीवन में भर देता संकोच।

गर मन से विद्या करो अर्जित,
मूढ़ भी विद्वान बन जाता।
कर्मभूमि के इस चक्र में फिर,
युगों-युगों तक यश पाता।

शिक्षा ही सच्चा ज्ञान दिलाती,
धरती पर सम्मान दिलाती।
चहुँमुखी विकास का दीप जलाकर,
जुगनू-सा प्रकाश फैलाती।

यह अज्ञान तम हर लेती है,
जीवन में नव प्रभात भरती।
सूखे मन के निर्जन वन में,
आशा की हरियाली करती।

तो श्रम करो, पुरुषार्थ जगाओ,
अपने जीवन को सफल बनाओ।
शिक्षा वह निर्मल अमृत है,
जिसे ग्रहण कर समर्थ बन जाओ।

कल के तुम निर्माणक हो,
भारत के नव-अभियानक हो।
विद्या को अपना शस्त्र बनाकर,
उज्ज्वल युग के उद्घोष के लायक हो।


 

Tuesday, February 18, 2025

फिर श्रृंगार नहीं होता......

 

बिन शब्दों का कभी भी
वाक्य विस्तार नहीं होता
जैसे बिन खेवनहार के
भव सागर पार नहीं होता

ऊँचा कुल या ऊँची पदवी से
बिन रिश्ते व्यापार नहीं होता
गाँठ पड़े हों रिश्तों में तो
पूर्ण अधिकार नहीं होता

झूठ, फरेब या लालच का
सदैव जय-जयकार नहीं होता
सच कष्टदायी जरूर होता है
मगर परिणाम बेकार नहीं होता

मन दुःखी और तन पीड़ित हो
फिर श्रृंगार नहीं होता
छालिया कितना भी शातिर हो
छल हर बार नहीं होता

पहली साजिश से सबक
अंतिम प्रहार नहीं होता
मात मिली हो जिस रिश्ते से
फिर उस रिश्ते को मन तैयार नहीं होता

कवि की कपोल कल्पनाओं में
पूर्ण सच्चाई का आधार नहीं होता
हर बात लिखी हो जो कोरे कागज पे
वैसा ही संसार नहीं होता ||


Thursday, January 2, 2025

करीब करीब सच...


 

बाहों में किसी के ख्वाबों मे कोई और है
गलती तेरी भी नहीं कमबख्त बेवफाई का ही दौर है
कैसे तू भी किसी एक की हो कर रह सकती है ताउम्र
कहां हुस्न पर इश्क की पाबंदियों का अब जोर है

इस स्टेपनी वाले ज़माने मे कहां गुजारा होगा एक बंदे से
तमाम खानदानो का घर चलता है इस बेवफाई के धंधे से
इश्क पे भारी पड़ने लगी है दौलत ए हुस्न की कालाबाजारी
जबरन खुद का ही घर जलाया जाता है नादां परिंदे से

जिसको तौला नहीं जा सकता उसे तौल रहे हैं लोग
चंद रुपयों के लिए खुद से भी झूठ बोल रहे है लोग
ना जाने कैसा दौर आ गया कमबख्त फरेबी लोगों का
इतिहास छोड़कर रिश्तों मे देख भूगोल रहे हैं लोग

झूठा साबित करने मे लगे हैं हर रिश्ते की तस्वीर को
मोहब्बत से भी ऊपर रखते हैं लोग जागीर को
पागल हुए फिरते हैं देखने को ताजमहल 'मगर'
कौन समझ पाया है यहाँ मुमताज की तकदीर को

यकीनन अब रांझा भी छोड़ सकता है हीर को
कोई क्यूँ सुनेगा अब बुल्लेशाह सरीखे फकीर को
सही गलत से क्या ही फरक पडता है किसी को यहां
जहां पवित्र आत्मा से ज्यादा तवज्जो मिलती हो शरीर को ||