तुम हो चंचल, तुम हो ढीठ,
आलस ने बाँधी मन की रीढ़।
लाख समझाया फिर भी तुम,
दोहराते हो भूलें अतीत।
ना गुरुजी की डाँट का भय,
ना अपमान का कोई संशय।
हरदम दण्ड की पंक्ति में खड़े,
फिर क्यों न चुनते हो सत्पथ नय।
शिक्षा तुमको लगती बोझ,
मजबूरी में ढोते बस्ते रोज।
बेमन से पाया गया जो ज्ञान,
जीवन में भर देता संकोच।
गर मन से विद्या करो अर्जित,
मूढ़ भी विद्वान बन जाता।
कर्मभूमि के इस चक्र में फिर,
युगों-युगों तक यश पाता।
शिक्षा ही सच्चा ज्ञान दिलाती,
धरती पर सम्मान दिलाती।
चहुँमुखी विकास का दीप जलाकर,
जुगनू-सा प्रकाश फैलाती।
यह अज्ञान तम हर लेती है,
जीवन में नव प्रभात भरती।
सूखे मन के निर्जन वन में,
आशा की हरियाली करती।
तो श्रम करो, पुरुषार्थ जगाओ,
अपने जीवन को सफल बनाओ।
शिक्षा वह निर्मल अमृत है,
जिसे ग्रहण कर समर्थ बन जाओ।
कल के तुम निर्माणक हो,
भारत के नव-अभियानक हो।
विद्या को अपना शस्त्र बनाकर,
उज्ज्वल युग के उद्घोष के लायक हो।


ठीठ या ढीठ ? सुन्दर
ReplyDeleteशुक्रिया 🙏
DeleteSelection of words are truly amazing 🙏
ReplyDeleteThank you so much
DeleteBahut sundar panktiyan
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteमुझे आपकी कविता में यह बात खास लगी कि आप डर या सजा नहीं, बल्कि समझ और मेहनत से सही रास्ता चुनने पर जोर देते हो। शिक्षा को बोझ नहीं, ताकत बताना आज बहुत जरूरी है। आप बताते हो कि सही मेहनत इंसान को साधारण से सम्मानित बना देती है।
ReplyDeleteशुक्रिया
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