Friday, July 7, 2023

इन्कार कर रहा हूँ



जीते जी चार कंधों का इंतजार कर रहा हूं

मैं हर दर पे मौत की दुआ हर बार कर रहा हूँ

जो चले गए वो ना लौटेंगे जो पास हैं वो साथ नहीं 

लोग भरोसा करते है लकीरों पे, मैं खुदा की रहमत से भी इंकार कर रहा हूँ 


जो उजड़ गए है इमारत सपनों के 

मैं दिलों जान से उन्हें बेजार कर रहा हूँ 

तुम खुश हो जहां भी हो ये भी सही तो है 

अब मैं ही खुद को तेरी महफिल से दर किनार कर रहा हूँ 


कभी लगता था तुम ही हो सबसे करीब मेरे 

अब खुद के ज़ख्मों को कुरेद के बीमार कर रहा हूँ 

घाव भर तो गए छाले अंदरूनी आज भी हैं मगर 

तेरे आने की आस में अब भी अपना वक्त बेकार कर रहा हूँ 


कभी मुझे मोहब्बत थी ज़िंदगी के हर लम्हे से 

अब खुद ही खुद को डुबाने के लिए तैयार कर रहा हूँ 

अब ना तुम रहे ना वो लम्हे ना दिलों मे जगह अपनी 

इसलिए खुद को तोड़ कर तार तार कर रहा हूँ 


हर टूटे टुकड़े मे अब सिर्फ मेरा आयाम होगा 

ना किसी की दास्तान ना नाम होगा 

अब खुद ही खुद को कोसते रहेंगे जिंदगी भर

ना किसी से उम्मीद ना किसी पे इल्ज़ाम होगा 








7 comments:

  1. अथाह दर्द समेटे हृदयस्पर्शि सृजन।।
    बहुत मार्मिक रचना।

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  2. बहुत ही भावपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  3. बेशुमार दर्द समेटे सुंदर रहना।
    Be positive 😊

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  4. आपकी हर पंक्ति में इतना दर्द, इतनी सच्चाई है कि पढ़ते-पढ़ते मन भारी हो जाता है। तुम्हारे शब्दों में वो कच्चापन है जो ज़िंदगी की असल टूटन दिखाता है, बिना किसी बनावट के। लगता है कोई अपने अंदर की राख से खुद को फिर से देखने की कोशिश कर रहा है।

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