Friday, March 14, 2025

शिक्षा : जीवन का आधार


 

तुम हो धूर्त, तुम हो ढीठ,
तुम हो श्वान के दुम की रीड़
तुम को समझाया लाख मगर
फिर भी गलतियाँ करते हो रिपीट (Repeat)

ना तुमको गुरुजी के छड़ी का भय
ना तुमको अपमान का संशय
हर वक़्त सजा की पंक्ति में खड़े
फिर क्यूँ न करते सत मार्ग को तय

शिक्षा तुमको लगती बोझ
मजबूरी मे ढोते बस्ते को रोज
बे मन से ग्रहण की गई शिक्षा
सिर्फ पैदा करती है संकोच

गर ध्यान से ज्ञान करो अर्जित,तो
विधुर से विद्वान बन जाते है
इस कालखण्ड के कर्म-चक्र से
सदि‌यों तक यश ही पाते हैं

शिक्षा ही है जो ज्ञान दिलाती
इस भूमण्डल में सम्मान दिलाती
चहुमुखी व सम्पूर्ण विकास कर
जुगुनू सा प्रकाश फैलाती

तो करो परिश्रम बन जाओ अफसर
फिर नवराष्ट्र निर्माण करो योग्य बनकर
शिक्षा वो पाक साफ अमृत है
असमर्थ भी सक्षम हो जाता जिसको पीकर ||


 

4 comments:

  1. Selection of words are truly amazing 🙏

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  2. मुझे आपकी कविता में यह बात खास लगी कि आप डर या सजा नहीं, बल्कि समझ और मेहनत से सही रास्ता चुनने पर जोर देते हो। शिक्षा को बोझ नहीं, ताकत बताना आज बहुत जरूरी है। आप बताते हो कि सही मेहनत इंसान को साधारण से सम्मानित बना देती है।

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