सबको लगता है कि वो अब ख्याल नहीं करता है,
पैसे तो भेजता है मगर देखभाल नहीं करता है।
कोई जा के बता दो परदेश में बैठे बेटे का हाल,
वो क्यूँ किसी से कोई सवाल नहीं करता है।
वो चुप है तो समझो कि हालात बोलते है,
रातों के अंधेरों में उसके ख़्वाब डोलते है।
रोटी की तलाश में जो घर से दूर निकला था,
अब अश्क ही आँखों का दर्द तोलते है।
माँ की दुआएँ अभी तक साथ चलती है,
बाप की उम्मीदें भी चुपचाप पिघलती है।
हर महीने के पैसे में उसका दिल भी आता है,
बस लफ़्ज़ों की कमी है, तभी बातें नहीं निकलती है।
भीड़ में रहकर भी वो तन्हा-सा हो जाता है,
अपनों की यादों में अक्सर ही खो जाता है।
वो पूछे भी तो क्या पूछे, किससे अपने दर्द कहे,
इसलिए चुपचाप वो खामोशी का हो जाता है।
तुम इल्ज़ाम न दो उसको, वो मजबूर बहुत है,
उसकी भी आँखों में छुपा एक नूर बहुत है।
वो ख्याल नहीं करता—ये कहना भी गलत नहीं,
वो निभा रहा है सब कुछ, मगर दूर बहुत है।


ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 1 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
आज के इस बेहतरीन अंक में मेरी रचना को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार और धन्यवाद 🙏
Deleteवाक़ई परदेश में गया आदमी देश को याद तो बहुत करता है
ReplyDeleteसही कहा आपने महोदया
DeleteBahut Sundar kavita
ReplyDeleteएक अनकहे दर्द को बयां करती है यह अभिव्यक्ति
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