Sunday, August 2, 2026

"रीलों में सिमटी पीढ़ी"


स्क्रीन की चमक में खोए चेहरे,

आँखों में सपनों का शोर नहीं।

हर पल चाहिए ताली दुनिया की,

पर भीतर कोई ठौर नहीं।


लाइक्स की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,

रिश्तों का आँगन भूल गए।

सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,

फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।


शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,

ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।

मेहनत से जो रिश्ता टूटा,

शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।


हर असहमति बनती नफ़रत,

हर आलोचना अपमान लगे।

दर्पण भी दुश्मन लगता है,

यदि सच का कोई निशान मिले।


याद रखो, इतिहास वही लिखता,

जो पसीने से कलम चलाता है।

क्षणिक प्रसिद्धि धूल बन जाती,

उत्तम चरित्र ही युगों तक यश पाता है।


हर युवा ऐसा नहीं होता,

बहुत-से दीप अभी भी जलते हैं।

जो श्रम, संस्कार और सत्य के संग,

कल के भारत को आगे लेकर चलते हैं।


"यह कविता किसी पूरी पीढ़ी पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर प्रश्न है जो मेहनत से अधिक दिखावे, चरित्र से अधिक प्रसिद्धि और सत्य से अधिक ट्रेंड को महत्व देती है।"




 

5 comments:

  1. The message about hard work (पसीने से कलम चलाना) over temporary fame is so powerful! Keep spreading such meaningful thoughts . So proud of this piece! 🌟

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    1. Thank you so much for your kind words! 🌿 It truly means a lot. As long as the pen is guided by honesty and hard work rather than temporary fame, I'll keep writing. Your support is deeply appreciated. 🙏

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  2. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया गुरुजी

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