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Wednesday, June 24, 2026

संबंधों की बंजर ज़मीन...

 


 कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,

कुछ लोग वफा करते ही नहीं।

अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,

तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।


अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,

पहले जैसे सँवरते ही नहीं।

जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,

वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।


इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,

अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।

एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,

अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।


क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही

बगिया को पानी से भरते ही नहीं।

अब राम-रहीम कभी एक राह से,

चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।


जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,

तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।

जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,

वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।


जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,

वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।

जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,

फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।


दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,

माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।

संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,

फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।



Wednesday, May 20, 2026

सृष्टि का सार...


 लिंग से यदि घृणा करोगे,

सृष्टि कहाँ फिर जन्मेगी?

बीजों का अपमान करोगे,

धरती कब तक फल देगी?


एकलिंग की शरण न ली तो,

काल क्षमा फिर क्यों होगा?

जो जड़ से ही विमुख हुआ है,

उसका कौन भविष्य संजोएगा?


यह देह नहीं, यह दर्शन है,

जो कण-कण में बहता है।

सृजन-शक्ति के मौन स्रोत-सा,

हर जीवन में रहता है।


जिसने अहंकारों में आकर

इसके सत्य को ठुकराया,

उसने अपने ही हाथों से

अपना कल धुएँ में पाया।


लिंग न केवल रूप प्रकृति का,

यह संतुलन की भाषा है।

जिसने इसके मर्म को जाना,

उसके संग समय की आशा है।


न इसे भोग का विषय समझो,

न भय का अंधकार कहो।

यह तो चेतन दीप शाश्वत,

जिससे जीवन राह गहो।


संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,

बाकी सब अनुमान यहाँ।

स्वीकारों से जग चलता है,

घृणा बने श्मशान यहाँ।


यह युद्ध नहीं, संवादों का

अनहद खुलता द्वार है।

जो इसे समझ कर जी लेता,

वही सृष्टि का सार है।



Wednesday, October 15, 2025

जिंदगी :- एक अजीब सी किताब



ज़िंदगी, तू अजीब सी किताब है,

कभी आँसू, कभी हँसी का सैलाब है।

कभी धूप में जलती उम्मीदों का सागर,

कभी छाँव में ठहरी कोई ख़्वाब-सा गुलाब है।


तेरे हर पन्ने पे कुछ लिखा सा लगता है,

कहीं अधूरा, कहीं मुकम्मल जहान टिका सा लगता है।

कभी ठोकरें देती है रास्तों पे चलने को,

कभी हाथ पकड़ कर सहारा देती है संभलने को।


कभी तू शिकवा बनकर छलकती है आँखों से,

कभी दुआ बनकर ठहर जाती है होंठों पे।

कभी खामोशियों में भी बोल उठती है,

कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास दिलाती है।


ज़िंदगी, तू सिखाती है —

हार में भी जीत की एक लकीर होती है,

हर अँधेरे के पीछे सुबह की ताबीर होती है।

गिरना भी मंज़िल का ही एक हिस्सा है,

सफलता के पीछे इंसान की तक़दीर होती है।


कभी दर्द, कभी गीत,

कभी मुस्कान, कभी प्रीत —

ज़िंदगी तू ना जाने कैसी पहेली है,

किसी के लिए सख्त प्रशिक्षक, किसी के लिए सहेली है।


Wednesday, July 30, 2025

मैं पंचतत्व हूँ.......

 


उठेगा जनाज़ा एक रोज़ और फिर राख हो जाऊँगा मैं

होकर पंचतत्व मे विलीन शायद पाक हो जाऊँगा मैं 

कुछ दिन सूना रहेगा मेरा कमरा और घर आँगन 

फिर धीरे धीरे सबके लिए अख़लाक़ हो जाऊँगा मैं 


किसी दीवार पर टंगी होगी फिर तस्वीर अपनी 

तब परमात्मा ही तोड़ेगा मोह की जंजीर अपनी 

भुला देगा मोह माया और संपति का लालच 

फिर किसी नयी योनी मे बनानी होगी स्वयं तकदीर अपनी 


फिर कोई बच्चा मेरी ही साँसों में जीवन पाएगा

मेरी परछाई बनके ही शायद वो भी मुस्कुराएगा

वो खेलेगा उन्हीं गलियों में जहाँ बचपन मेरा पला

पर न जाने कौन उसे मेरे बारे मे बतायेगा 


शायद एक वृक्ष बन किसी छाँव का कारण बनूँगा

या किसी श्मशान की राख में फिर मौन सा सज़ूँगा

दुनिया के मेले में कोई नहीं रोकेगा पथ मेरा

क्योंकि मिट्टी हूँ मैं — पंचतत्व मे विलीन होकर भी रहूँगा 


जिसे समझा मैंने "मेरा", सब यहीं रह जाएगा

तो आज जो हूँ, वही सत्य जीवन पर्यन्त नहीं है

बस आत्मा ही है जो चुपचाप सफर तय कर जाएगा

क्योंकि अंत भी तो जीवन का कोई अंत नहीं है...