गगन रोया तो मिट्टी की काया काँप उठी,
जड़ों में दफ़्न सदियों की माया काँप उठी।
बादल के फटने से ज़मीं खिसकी कुछ यूँ,
कि दरख़्तों संग पहाड़ की छाया काँप उठी।
जहाँ हरियाली कभी जीवन का उजाला था,
हर पगडंडी पर उम्मीदों का बोलबाला था।
मलबे में दफ़्न हो गईं गाँव की राहें सारी,
जिसने लौटता हर मुसाफ़िर को सम्भाला था।
ये चीड़ के दरख़्त जो आँधियों से लड़े थे,
पहाड़ के सीने पर पहरेदार बन खड़े थे।
आज जड़ों समेत ढलानों पर बहते हैं यूँ,
मानो अपने ही घर की चौखट से उखड़े थे।
जिस आँगन में कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी,
हर शाम जहाँ लौटकर ख़ुशी भी झूमती थी।
आज उसी चौखट पर सन्नाटा सोया है,
जहाँ माँ हर शाम आवाज लगाए घूमती थी।
कुदरत के आगे इंसान का हौसला टूट गया,
गाँव का वो पुराना हँसता मंज़र छूट गया।
तबाही लिख गई ज़मीन पर एक नया अफ़साना,
जिसे देख पल भर में अश्कों का सैलाब फूट गया।
पहाड़ आज भी खड़ा है, मगर ख़ामोश है,
सीने में न जाने कितने ज़ख़्मों का बोझ है।
वो रो नहीं सकता—उसकी आँखें पत्थर हैं,
मगर वो अपनों के लिए अब भी तड़पता रोज है।
कभी लौटकर देखना उस पहाड़ की आँखों में,
वहाँ सिर्फ़ पत्थर नहीं, कई सपने मिलेंगे।
कुछ रास्ते, कुछ घर, कुछ रिश्ते दबे होंगे,
मिट्टी कुरेदोगे तो शायद अपने मिलेंगे।


Bahut dukhat hai pahad ki dashaaaaa .. behtareen rachna 👍
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