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Monday, September 14, 2026

मिट्टी कुरेदोगे तो अपने मिलेंगे..

 

गगन रोया तो मिट्टी की काया काँप उठी,
जड़ों में दफ़्न सदियों की माया काँप उठी।
बादल के फटने से ज़मीं खिसकी कुछ यूँ,
कि दरख़्तों संग पहाड़ की छाया काँप उठी।

जहाँ हरियाली कभी जीवन का उजाला था,
हर पगडंडी पर उम्मीदों का बोलबाला था।
मलबे में दफ़्न हो गईं गाँव की राहें सारी,
जिसने लौटता हर मुसाफ़िर को सम्भाला था।

ये चीड़ के दरख़्त जो आँधियों से लड़े थे,
पहाड़ के सीने पर पहरेदार बन खड़े थे।
आज जड़ों समेत ढलानों पर बहते हैं यूँ,
मानो अपने ही घर की चौखट से उखड़े थे।

जिस आँगन में कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी,
हर शाम जहाँ लौटकर ख़ुशी भी झूमती थी।
आज उसी चौखट पर सन्नाटा सोया है,
जहाँ माँ हर शाम आवाज लगाए घूमती थी।

कुदरत के आगे इंसान का हौसला टूट गया,
गाँव का वो पुराना हँसता मंज़र छूट गया।
तबाही लिख गई ज़मीन पर एक नया अफ़साना,
जिसे देख पल भर में अश्कों का सैलाब फूट गया।

पहाड़ आज भी खड़ा है, मगर ख़ामोश है,
सीने में न जाने कितने ज़ख़्मों का बोझ है।
वो रो नहीं सकता—उसकी आँखें पत्थर हैं,
मगर वो अपनों के लिए अब भी तड़पता रोज है।

कभी लौटकर देखना उस पहाड़ की आँखों में,
वहाँ सिर्फ़ पत्थर नहीं, कई सपने मिलेंगे।
कुछ रास्ते, कुछ घर, कुछ रिश्ते दबे होंगे,
मिट्टी कुरेदोगे तो शायद अपने मिलेंगे।





Friday, December 5, 2025

उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)


मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।

तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।

मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।

सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।