दिल को समझा लिया मगर मलाल अब भी है,
सब कुछ ख़त्म हो गया मगर ‘क्यों’ सवाल अब भी है।
सारी यादें, वादे और तोहफ़े जला आए हम कब के,
मगर उसका दिया पहला रुमाल अब भी है।
ये न कहना कि हमें ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा,
जिस्म तंदुरुस्त भले, दिल बेहाल अब भी है।
आईना भी पकड़ नहीं सकता सच हमारा,
लबों पे हँसी है मगर आँखें लाल अब भी हैं।
जो छोड़ गए थे, उन्हें कभी पलटकर हमने भी नहीं देखा,
किस तरह उस गली से हुए थे रुख़्सत, ख़याल अब भी है।
अब भी पाँव काँपते हैं वापस लौटने का सोचकर,
सारे फ़साद मिट गए मगर रूह पामाल अब भी है।
न मैं, न मेरे ज़ख़्म करेंगे कभी माफ़ तुम्हें,
नफ़रत के बाद भी न जाने क्यों मोह का जंजाल अब भी है।
हर रोज़ कुरेदा है ज़ख़्म, न भरने देने के लिए,
आत्मा मर चुकी है मगर लहू में उबाल अब भी है।
न तुम चाहिए, न तुम्हारी यादें चाहिए अब,
मगर पीठ पे चिपका यादों का बेताल अब भी है।
मैं ख़ुश हूँ जैसा हूँ, जहाँ भी हूँ अब,
क्या सच में ख़ुश हूँ—दिल में ये सवाल अब भी है?

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ReplyDeleteवाह! 👌👌
ReplyDelete“किस तरह उस गली से हुए थे रुख़्सत, ख़याल अब भी है।”
और
“मैं ख़ुश हूँ जैसा हूँ, जहाँ भी हूँ अब,
क्या सच में ख़ुश हूँ–दिल में ये सवाल अब भी है”
पंक्तियांँ विशेष ध्यानाकर्षित कर ही रही हैं। विस्तार दिए बगैर भी कविता पूरी करने की सामर्थ्य है इनमें।📚
बहुत बहुत आभार
Deleteदिल को समझा नहीं पाये तभी न यह हालत है, दिल को समझाना आता तो वर्तमान में जीना भी आ जाता, आकाश में जैसे तूफ़ानी काले बादल कल आये थे पर आज का नीला आकाश उसे याद नहीं करता, वह आज की धूप में आनंदित है
ReplyDelete“शायद सही कहते हैं आप… मगर दिल भी उस आकाश की तरह कहाँ है, जो बीते तूफ़ान को इतनी आसानी से भुला दे। कुछ बादल बरसकर चले जाते हैं, लेकिन उनकी नमी मिट्टी की तरह दिल में बहुत देर तक रहती है। फिर भी कोशिश जारी है—शायद एक दिन आज की धूप में जीना सचमुच सीख जाएँ।”
Deleteसुंदर
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