बूढ़े और क्षीण विचारों को उखाड़ फेंके,
मैं वो नयी और ज्वलंत सोच हूँ,
इस सिस्टम के नस-नस में घुसकर बदलाव करूँगा,
मैं वो ईमानदार "कॉकरोच" हूँ।
अंधेरों की सीलन में भी जो
ज़िंदा रहने का साहस रखता है,
झूठे महलों की बुनियादों में
सच बनकर जो धँसता है।
ना सूटों की चमक से बिकता,
भाषण से भी बहलाया न जाने वाला आक्रोश हूँ,
तुम जिसको कीड़ा कहते फिरते "जज साहब" ,
मैं वही सवाल उठाता "कॉकरोच" हूँ।
तख़्तों के नीचे पलते डर को
दिन के उजाले में लाऊँगा,
जो खाते हैं जनता का हिस्सा
उनके चेहरे गिनवाऊँगा।
सत्ता के रसोड़े से उठता
गरीब जनता का बरसों का अफ़सोस हूँ,
उस बदबूदार व्यवस्था के आगे ना झुकने वाला,
मैं निडर अडिग "कॉकरोच" हूँ।
मैं नारा नहीं, चेतावनी हूँ,
सड़कों की सच्ची आह हूँ,
तुम्हारे बंद कमरों में घुसती
जनता की खुलती चाह हूँ।
अब डरना तुमको होगा साहब,
मैं जनता को जगाता हर रोज हूँ,
हर गली में, हर मोहल्ले में पलता,
मैं जिंदा खड़ा "कॉकरोच" हूँ।
