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Monday, June 15, 2026
कॉकरोच का घोषणा पत्र..
बूढ़े और क्षीण विचारों को उखाड़ फेंके,
मैं वो नयी और ज्वलंत सोच हूँ,
इस सिस्टम के नस-नस में घुसकर बदलाव करूँगा,
मैं वो ईमानदार "कॉकरोच" हूँ।
अंधेरों की सीलन में भी जो
ज़िंदा रहने का साहस रखता है,
झूठे महलों की बुनियादों में
सच बनकर जो धँसता है।
ना सूटों की चमक से बिकता,
भाषण से भी बहलाया न जाने वाला आक्रोश हूँ,
तुम जिसको कीड़ा कहते फिरते "जज साहब" ,
मैं वही सवाल उठाता "कॉकरोच" हूँ।
तख़्तों के नीचे पलते डर को
दिन के उजाले में लाऊँगा,
जो खाते हैं जनता का हिस्सा
उनके चेहरे गिनवाऊँगा।
सत्ता के रसोड़े से उठता
गरीब जनता का बरसों का अफ़सोस हूँ,
उस बदबूदार व्यवस्था के आगे ना झुकने वाला,
मैं निडर अडिग "कॉकरोच" हूँ।
मैं नारा नहीं, चेतावनी हूँ,
सड़कों की सच्ची आह हूँ,
तुम्हारे बंद कमरों में घुसती
जनता की खुलती चाह हूँ।
अब डरना तुमको होगा साहब,
मैं जनता को जगाता हर रोज हूँ,
हर गली में, हर मोहल्ले में पलता,
मैं जिंदा खड़ा "कॉकरोच" हूँ।
Sunday, December 17, 2023
हार कर फांसी पे चढ़ गया...
बेरोज़गार मेरे राज्य का, काँच-सा बिखर गया,
इम्तिहान देना चाहता था, घोटालों से डर गया।
नियुक्तियाँ सब खा गए, नेता के रिश्तेदार,
ज्यों पालक की बेड़ी को, खुला सांड चर गया।
विज्ञप्तियों के इंतज़ार में, चश्मे का नंबर बढ़ गया,
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में, वो खुद से ही पिछड़ गया।
सोचा था पहाड़ रहकर, गाँव-घर सँवारेंगे,
पर उसका हर एक ख़्वाब, राजनीति में गड़ गया।
फिर भी हौसला समेटकर, हालातों से लड़ गया,
ना वक़्त साथ दे सका, अपनों से भी बिछड़ गया।
नाकामियाँ मजबूर कर, हार उसकी गढ़ रहीं,
ज्यों कच्चा फल डाल पर, पकने से पहले सड़ गया।
दीमक लगी प्रतिभा को, संतुलन भी बिगड़ गया,
फिर भी सफलता के लिए, किस्मत से वो अड़ गया।
आख़िर जला दीं डिग्रियाँ, सपनों की हर पोटली,
एक और बेरोज़गार फिर, फाँसी पे चढ़ गया।
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