खोने को कुछ नहीं,
पाने को पूरा आसमान पड़ा है,
एक व्याकुल, विचलित शख़्स
आज चौराहे पर खड़ा है।
दोहरी मनोदशा के घोड़े पर
सवार उसका हर विचार है,
वह कोई और नहीं साहिब,
एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
रातों को नींद गिरवी रखकर
जिसने सपनों को सींचा था,
उम्मीदों की फाइलों में
अपने कल को खींचा था,
आज वही अपनी ही आँखों में
एक अनकहा-सा भार है,
भँवर से तो निकल आया,
पर नौका अब भी मझधार है।
हाथों में डिग्रियों का पुलिंदा,
दिल में उम्मीदों की आग लिए,
दर-दर दस्तक देता फिरता,
हर दफ़्तर की चौखट नाप लिए,
देश का भविष्य कहे जाने वाला
आज खुद से शर्मसार है,
असहाय-सा खड़ा हुआ
एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
मंज़िल पाने को आतुर है,
पर अवसर कोसों दूर खड़े,
जो कल तक घर का गौरव था,
आज वही तानों में जकड़े।
माथे पर शिकन की लकीरें,
चेहरे पर थकान की मार है,
हालातों से जूझता हर दिन
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
कागज़ की रद्दी-सी लगती
अब दर्जनों डिग्रियाँ सारी,
फ्रेमों में कैद प्रमाणपत्र,
जैसे बीते कल की बीमारी।
रोज़ नए फॉर्म, नई परीक्षा,
फिर भी खाली हर दरबार है,
निराशा में आशा ढूँढ़ता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
देश बहसों में उलझा बैठा,
मंदिर-मस्जिद के नारों में,
रोज़गार की बात दब गई
वायदों के अख़बारों में।
मंचों पर भाषण ऊँचे हैं,
ज़मीं पर सूखा बाज़ार है,
सपनों का बोझ उठाए फिरता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
मनोबल टूटा कई दफ़ा
अपनों के तिरस्कार से,
“निकम्मा”, “निठल्ला” सुनता रहा
रिश्तों के खुले बाज़ार से।
फिर भी हौसले बाँधकर
वह संघर्ष को तैयार है,
डगमगाते कदम सँभालता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
चाचा आयोग में नहीं,
जीजा किसी विभाग में नहीं,
मेहनत अक्सर हार जाती
भाई-भतीजावाद के आगे कहीं।
काबिलियत कतारों में खड़ी,
सिफ़ारिश हर शह पर सवार है,
फिर भी सफलता की आस लिए
हर पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।
हार नहीं मानी अब तक उसने,
बस थोड़ा थका थोड़ा लाचार है,
भीड़ भरे इस देश में शायद
वह खुद से बिछड़ा हुआ यार है।
फिर भी सफलता की आश लगाए,
हर पढ़ा लिखा बेरोजगार है।
