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Sunday, December 17, 2023

हार कर फांसी पे चढ़ गया...

 


बेरोज़गार मेरे राज्य का, काँच-सा बिखर गया,

इम्तिहान देना चाहता था, घोटालों से डर गया।


नियुक्तियाँ सब खा गए, नेता के रिश्तेदार,

ज्यों पालक की बेड़ी को, खुला सांड चर गया।


विज्ञप्तियों के इंतज़ार में, चश्मे का नंबर बढ़ गया,

प्रतिस्पर्धा की दौड़ में, वो खुद से ही पिछड़ गया।


सोचा था पहाड़ रहकर, गाँव-घर सँवारेंगे,

पर उसका हर एक ख़्वाब, राजनीति में गड़ गया।


फिर भी हौसला समेटकर, हालातों से लड़ गया,

ना वक़्त साथ दे सका, अपनों से भी बिछड़ गया।


नाकामियाँ मजबूर कर, हार उसकी गढ़ रहीं,

ज्यों कच्चा फल डाल पर, पकने से पहले सड़ गया।


दीमक लगी प्रतिभा को, संतुलन भी बिगड़ गया,

फिर भी सफलता के लिए, किस्मत से वो अड़ गया।


आख़िर जला दीं डिग्रियाँ, सपनों की हर पोटली,

एक और बेरोज़गार फिर, फाँसी पे चढ़ गया।






Friday, March 4, 2022

पढ़ा लिखा बेरोजगार...




खोने को कुछ नहीं,
पाने को पूरा आसमान पड़ा है,
एक व्याकुल, विचलित शख़्स
आज चौराहे पर खड़ा है।
दोहरी मनोदशा के घोड़े पर
सवार उसका हर विचार है,
वह कोई और नहीं साहिब,
एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

रातों को नींद गिरवी रखकर
जिसने सपनों को सींचा था,
उम्मीदों की फाइलों में
अपने कल को खींचा था,
आज वही अपनी ही आँखों में
एक अनकहा-सा भार है,
भँवर से तो निकल आया,
पर नौका अब भी मझधार है।

हाथों में डिग्रियों का पुलिंदा,
दिल में उम्मीदों की आग लिए,
दर-दर दस्तक देता फिरता,
हर दफ़्तर की चौखट नाप लिए,
देश का भविष्य कहे जाने वाला
आज खुद से शर्मसार है,
असहाय-सा खड़ा हुआ
एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

मंज़िल पाने को आतुर है,
पर अवसर कोसों दूर खड़े,
जो कल तक घर का गौरव था,
आज वही तानों में जकड़े।
माथे पर शिकन की लकीरें,
चेहरे पर थकान की मार है,
हालातों से जूझता हर दिन
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

कागज़ की रद्दी-सी लगती
अब दर्जनों डिग्रियाँ सारी,
फ्रेमों में कैद प्रमाणपत्र,
जैसे बीते कल की बीमारी।
रोज़ नए फॉर्म, नई परीक्षा,
फिर भी खाली हर दरबार है,
निराशा में आशा ढूँढ़ता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

देश बहसों में उलझा बैठा,
मंदिर-मस्जिद के नारों में,
रोज़गार की बात दब गई
वायदों के अख़बारों में।
मंचों पर भाषण ऊँचे हैं,
ज़मीं पर सूखा बाज़ार है,
सपनों का बोझ उठाए फिरता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

मनोबल टूटा कई दफ़ा
अपनों के तिरस्कार से,
“निकम्मा”, “निठल्ला” सुनता रहा
रिश्तों के खुले बाज़ार से।
फिर भी हौसले बाँधकर
वह संघर्ष को तैयार है,
डगमगाते कदम सँभालता
पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

चाचा आयोग में नहीं,
जीजा किसी विभाग में नहीं,
मेहनत अक्सर हार जाती
भाई-भतीजावाद के आगे कहीं।
काबिलियत कतारों में खड़ी,
सिफ़ारिश हर शह पर सवार है,
फिर भी सफलता की आस लिए
हर पढ़ा-लिखा बेरोज़गार है।

हार नहीं मानी अब तक उसने,
बस थोड़ा थका थोड़ा लाचार है,
भीड़ भरे इस देश में शायद
वह खुद से बिछड़ा हुआ यार है।
फिर भी सफलता की आश लगाए, 
हर पढ़ा लिखा बेरोजगार है।