धीरे-धीरे ज़िंदगी से बाज़ी हारी जा रही है,
अश्क़ों को आँखों में लिए, वो बेचारी जा रही है।
पहले नोचा जिस्म, फिर दिल के भी टुकड़े कर दिए,
मौत से बदतर अब वो, ज़िंदगी गुज़ारी जा रही है।
ऐसा क्या गुनाह किया कि, साँस भी रुकती नहीं,
मृत्यु भी उसको बस, दूर से निहारी जा रही है।
मुफ़लिसी थी वजह या, प्रेम करना महँगा पड़ा,
सरेआम ही उसकी अब, इज़्ज़त उतारी जा रही है।
नादानी में जो हुआ, उससे बस इतना गुनाह,
जिस्म तुझको सौंप दिया, रूह भटकती जा रही है।
पेट में जो पल रहा है, दोनों की नादानी का फल है
फिर अकेले ही वो क्यूँ, कुलटा पुकारी जा रही है?
तुम ही हो उसके, बहते ख़ून के ज़िम्मेदार,
फिर क्यों अकेली उसको, ये बीमारी खा रही है?
मानो या न मानो, ज़मीर कोसता तो होगा ही,
देख, ग़लतियों की एक, जिंदा लाश तुम्हारी जा रही है।
गुनाह तेरे थे और, गुनहगार उसको ठहरा दिया,
अब दर्द सहने की वही, तेरी बारी आ रही है।
उसका रोना और, मायूसी भरे हर लम्हा
देख लौटकर अब, हिसाब लेने सारी आ रही है
उजाड़ा था फूल किसी, लाचार बाप के आँगन का,
आज अपनी बेटी के लिए, बगिया सँवारी जा रही है।
कर्म है लौटकर आता है, यक़ीनन,
देख खून मे लथपथ, बेटी तुम्हारी आ रही है।|
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Wednesday, October 22, 2025
“वो जो गुनहगार नहीं थी — एक जिंदा लाश की दास्तान”
Thursday, November 7, 2024
हया भी कोई चीज होती है...
हया भी कोई चीज होती है
अधोवस्त्र एक सीमा तक ही ठीक होती है
संस्कार नहीं कहते तुम नुमाइश करो जिस्म की
पूर्ण परिधान आद्य नहीं तहजीब होती है
नोच खाते हैं लोग आँखों से ही खुले कलित तन को
तभी कहावत में भी बेटी बाप के लिए बोझ होती है
मैं कौन होता हूँ आपकी आजादी का हनन करने वाला
बस जानता हूं किसकी कैसी सोच होती है
कुछ दुष्ट तो पालने में पड़ी बच्ची को भी नहीं छोड़ते
तू तो हरदम इन जानवरों के बीच होती है
तुझे खुद भी पता है हकीकत इस सभ्य समाज की
मंदिर मस्जिद में बैठे आडंबरियों की तक सोच गलीच होती हैं
न मुझे न मेरी लेखनी को देखना हीन नज़रों से
हर मर्ज की न उपचार ताबीज़ होती है
कहीं टुकड़ों में बिखरे न मिलो दुष्कर्म का शिकार होकर
तभी कह रहा हूं हया भी कोई चीज होती है ॥
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