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Wednesday, May 20, 2026

सृष्टि का सार...


 लिंग से यदि घृणा करोगे,

सृष्टि कहाँ फिर जन्मेगी?

बीजों का अपमान करोगे,

धरती कब तक फल देगी?


एकलिंग की शरण न ली तो,

काल क्षमा फिर क्यों होगा?

जो जड़ से ही विमुख हुआ है,

उसका कौन भविष्य संजोएगा?


यह देह नहीं, यह दर्शन है,

जो कण-कण में बहता है।

सृजन-शक्ति के मौन स्रोत-सा,

हर जीवन में रहता है।


जिसने अहंकारों में आकर

इसके सत्य को ठुकराया,

उसने अपने ही हाथों से

अपना कल धुएँ में पाया।


लिंग न केवल रूप प्रकृति का,

यह संतुलन की भाषा है।

जिसने इसके मर्म को जाना,

उसके संग समय की आशा है।


न इसे भोग का विषय समझो,

न भय का अंधकार कहो।

यह तो चेतन दीप शाश्वत,

जिससे जीवन राह गहो।


संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,

बाकी सब अनुमान यहाँ।

स्वीकारों से जग चलता है,

घृणा बने श्मशान यहाँ।


यह युद्ध नहीं, संवादों का

अनहद खुलता द्वार है।

जो इसे समझ कर जी लेता,

वही सृष्टि का सार है।