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Friday, December 5, 2025

उजड़ा आशियाना ( प्रकृति की मार)


मलबे के ढेर पर बैठा, वो अपना सब कुछ खोकर,
छिपा लिया है चेहरा हाथों में, शायद जी भर रोकर।
कल तक जो एक हँसता-खेलता घर था,
आज वो बस टूटी लकड़ियों और कीचड़ का मंज़र था।

तिनका-तिनका जोड़कर, उम्र भर जो गृहस्थी सजाई थी,
कुदरत के एक कहर ने, पल भर में सब मिटाई थी।
जिन दीवारों में गूँजती थी कभी अपनों की किलकारी,
वहाँ आज पसरी है बस ख़ामोशी और लाचारी।

मिट्टी में सने वो हाथ, जो कभी मेहनत से ना थकते थे,
आज अपनी ही बर्बादी के टुकड़े समेटने को तरसते थे।
आँखों से बहते आँसू, अब सूखकर पत्थर हो गए,
सपने जो देखे थे कल, वो इस सैलाब में कहीं खो गए।

सामने लगा ‘राहत शिविर’ का बोर्ड उसे चिढ़ाता है,
अपने ही घर का राजा, आज भिखारी नज़र आता है।
यह सिर्फ मकान नहीं टूटा, एक इंसान का हौसला टूटा है,
कुदरत, तेरे खेल ने आज फिर एक गरीब का घर लूटा है।







Tuesday, November 16, 2021

हाँ मैं एक पुरुष हूँ...



हाँ, मैं एक पुरुष हूँ,
पुरुष होने पर मुझे गर्व भी है।
मगर स्त्री का विरोध करूँ,
मेरे संस्कारों में ऐसा कभी नहीं।

स्वाभिमान मेरी पहचान है,
अभिमान मेरा स्वभाव कभी नहीं।
अपने सम्मान की रक्षा करता हूँ,
पर नारी का अपमान सोचूँ—ऐसा कभी नहीं।

स्त्री और पुरुष प्रतिद्वंद्वी नहीं,
जीवन-रथ के दो पहिए हैं।
एक के बिना दूसरा अधूरा है,
दोनों मिलकर ही जीवन जीते हैं।

जहाँ सम्मान और समझदारी बसती है,
वहाँ शक पनपता कभी नहीं।
विश्वास की नींव यदि गहरी हो,
तो रिश्ता बिखरता कभी नहीं।

चलें अगर दोनों कंधे से कंधा मिलाकर,
तो हर मुश्किल आसान हो जाती है।
साथ हो विश्वास और समर्पण का,
तो हर मंज़िल मुस्कुराती है।

नर हो या नारी, दोनों ही
परमब्रह्म की अनुपम संतान हैं।
फिर ऊँच-नीच का भेद रच देना,
मानव का भ्रम है, ईश्वर का विधान नहीं।

अधिकारों की लड़ाई हो,
तो कर्तव्यों का साथ भी होना चाहिए।
सम्मान अगर दोनों को चाहिए,
तो सम्मान देना भी आना चाहिए।

हाँ, मैं एक पुरुष हूँ,
इस बात का मुझे अभिमान है।
मगर हर स्त्री का सम्मान करना ही
मेरे चरित्र की पहचान है।

मैं न किसी के अधिकारों का विरोधी हूँ,
न किसी की स्वतंत्रता से भयभीत।
मैं केवल इतना मानता हूँ—
स्त्री और पुरुष विरोधी नहीं, एक-दूसरे के पूरक हैं।