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Thursday, July 14, 2022

तलबगार नहीं होंगे....


हम एक-दूसरे के अब तलबगार नहीं होंगे,
तुमने मन बना लिया है बिछड़ने का, तो ये भी ठीक है,
तेरी किसी महफ़िल में अब हम शुमार नहीं होंगे।

अब खुशियों से भी शायद हम बेजार नहीं होंगे,
गर मेरी परछाईं से भी तेरे चेहरे पर शिकन आती है,
वादा रहा, इस सूरत के फिर दीदार नहीं होंगे।

कल भी महफ़िलें सजेंगी मगर वो बहार नहीं होंगी,
चेहरों की भीड़ होगी मगर दिल के यार नहीं होंगे,
उन रौनकों के हम कभी हिस्सेदार नहीं होंगे।

सच्चाई छापनी हो तो शायद वो अख़बार नहीं होंगे,
बोली लगेगी जज़्बातों की और रिश्ते भी नीलाम होंगे,
मगर वफ़ा खरीद सकें ऐसे बाज़ार नहीं होंगे।

एक दिन तुम भी टूटोगे, सपने सभी तेरे साकार नहीं होंगे,
बहुत तड़पकर करोगे याद और मिलने की मिन्नत,
मगर उस दिन तेरे हम तलबगार नहीं होंगे।