देश में निष्कलुष और निष्पक्ष राज सबको चाहिए,
जो सत्तर बरस न मिल सका, वह आज सबको चाहिए।
कैसी दोहरी मानसिकता लेकर जी रहे हैं लोग,
नफ़रत का ज़हर बाँटकर सभ्य समाज सबको चाहिए।
क्यों नहीं पूछता कोई उनसे सवाल आज भी,
जिनके हाथों डगमगाई वर्षों ढाल समाज की।
आज जब हिन्दू हित की बात ज़ुबाँ पर आ रही,
फिर क्यों बढ़ रही है कुछ लोगों की नाराज़गी?
अपनी ही धरती पर भी अत्याचारों का दौर रहा,
जज़िया का बोझ, भय का साया, कितना कुछ और रहा।
जब मंदिरों पर वार हुए, आस्था भी लहूलुहान हुई,
इतिहास की कितनी पीड़ाओं पर सन्नाटा घोर रहा।
जो लूटने आए थे, वे लुटेरे लौट गए,
घर के विश्वासघातियों से कितने अपने टूट गए।
इतिहास के कुछ पन्नों ने उन्हें दोषी ठहराया, मगर
उनके घिनौने कृत्यों के कितने अध्याय फिर भी छूट गए।
कैद हुए पिता, भाई से भाई का भी रक्त बहा,
सत्ता की अंधी पिपासा में मानवता का शीश झुका।
मंदिर रोए, बस्तियाँ जलीं, जन-जन ने संताप सहा,
फिर भी उन ज़ालिमों का अत्याचार न एक पल रुका।
सब ही दगाबाज़ थे, फिर सबको सब पर संशय हुआ,
विलास और विश्वासघात में उनका अंत तय हुआ।
जब मानवता कराह उठी सत्ता के अंधे जुनून में,
तब भारत के नव-सूर्य सम्राट चन्द्रगुप्त का उदय हुआ।
शिवाजी, महाराणा, पृथ्वीराज का फिर गुणगान होगा,
लुटेरों का नहीं, अब वीरों का ही सम्मान होगा।
गोरा-बादल की अमर गाथा जन-जन तक पहुँचाई जाएगी,
बलिदानों की गौरवगाथा से नई पीढ़ी का निर्माण होगा।
भीड़ की हर हिंसा गलत है, हर निर्दोष की पीड़ा समान है।
कश्मीरी हिन्दुओं का दुःख फिर क्यों अनजाना जहान है?
इतिहास न आधा पढ़ा जाए, न सच दबाने की हो कोशिश,
झूठ चाहे जितना सज जाए, सच से परिचित हर इंसान है।
जब सह रहा था सितम हिन्दू, सबकी आँखें बंद थीं,
उसकी पीड़ा पर न जाने क्यों सबकी ज़ुबान भी मंद थी।
मॉब लिंचिंग की बात होती है, कश्मीरी हिन्दुओं पर क्यों नहीं?
बस यही दोहरापन तुम्हारा, हमको वर्षों से पसंद नहीं।
राष्ट्र नहीं बनता केवल सत्ता, धर्म या नारों से,
राष्ट्र बनता है सत्य, साहस, त्याग और संस्कारों से।
कोई कितना भी महिमामंडन कर ले इश्तिहारों में,
सच कभी छिप नहीं सकता, ईमानदार पत्रकारों से।