Saturday, September 16, 2023

मैं किसी के लिए बेशकीमती, किसी के लिए बेकार हूँ


 मैं कब कहाँ क्या लिख दूँ
इस बात से खुद भी बेजार हूँ
मैं किसी के लिए बेशकीमती
किसी के लिए बेकार हूँ

समझ सका जो अब तक मुझको
कायल मेरी छवि का है 
मुझमे अंधकार है अमावस सा 
मुझमे तेज रवि का है 

अब कैसे पलट दूँ परिस्थितियों को 
हर रोज मुश्किलों से होता दो चार हूँ 
मैं किसी के लिए ध्रुव तारा सा 
किसी के लिए बेकार हूँ 

मैं निराकार मे भी आकर भर दूँ 
मैं सैलाब से लड़ता किनारा हूँ 
मैं सकल परिस्थिति मे खुद का भी नहीं 
मैं संकट में सदैव साथ तुम्हारा हूं 

मैं रेगिस्तान मे फूल उगाने को 
हर पल रहता तैयार हूँ 
मैं किसी के लिए आखिरी उम्मीद 
किसी के लिए बेकार हूँ 

मैं भेद नहीं करता धर्मों मे 
पर शंख, तिलक मेरे लिए अभिमान है 
मैं भक्त भले प्रभु श्रीराम का 
पर एक मेरे लिए गीता और कुरान है 

मैं छेड़छाड़ नहीं करता संविधान से 
पर हक के लिए लड़ता लगातार हूँ 
मैं किसी के लिए सच्चा नागरिक 
किसी के लिए बेकार हूँ 





Friday, July 7, 2023

इन्कार कर रहा हूँ



जीते जी चार कंधों का इंतजार कर रहा हूं

मैं हर दर पे मौत की दुआ हर बार कर रहा हूँ

जो चले गए वो ना लौटेंगे जो पास हैं वो साथ नहीं 

लोग भरोसा करते है लकीरों पे, मैं खुदा की रहमत से भी इंकार कर रहा हूँ 


जो उजड़ गए है इमारत सपनों के 

मैं दिलों जान से उन्हें बेजार कर रहा हूँ 

तुम खुश हो जहां भी हो ये भी सही तो है 

अब मैं ही खुद को तेरी महफिल से दर किनार कर रहा हूँ 


कभी लगता था तुम ही हो सबसे करीब मेरे 

अब खुद के ज़ख्मों को कुरेद के बीमार कर रहा हूँ 

घाव भर तो गए छाले अंदरूनी आज भी हैं मगर 

तेरे आने की आस में अब भी अपना वक्त बेकार कर रहा हूँ 


कभी मुझे मोहब्बत थी ज़िंदगी के हर लम्हे से 

अब खुद ही खुद को डुबाने के लिए तैयार कर रहा हूँ 

अब ना तुम रहे ना वो लम्हे ना दिलों मे जगह अपनी 

इसलिए खुद को तोड़ कर तार तार कर रहा हूँ 


हर टूटे टुकड़े मे अब सिर्फ मेरा आयाम होगा 

ना किसी की दास्तान ना नाम होगा 

अब खुद ही खुद को कोसते रहेंगे जिंदगी भर

ना किसी से उम्मीद ना किसी पे इल्ज़ाम होगा 








Sunday, April 30, 2023

धरती माँ की पुकार...

 


यह धरा हमारी भू-जननी,
जहाँ हमने नश्वर जीवन पाया है,
जिसका अमृत-सा जल पिया,
प्राणों का अन्न भी खाया है।
सदियों पुराना इतिहास जिसका,
भिन्न उत्पत्तियों की कहानी है,
नष्ट हो रही जो मनु-कृत्यों से,
इसको हमने बचानी है।
धरती माँ के वृक्ष काट रहे,
बारूदी बल पर धरा बाँट रहे,
सूख रहे जलप्रपात भू-मंडल के,
सूख रहा सब पानी है।
कहीं करो जल-संरक्षण,
कहीं करो वृक्षारोपण,
फिर नवजीवन धरा पर लानी है।
जब धरा का जर्रा-जर्रा
हरियाली से गुलज़ार होगा,
कभी न सूखे की मार पड़ेगी,
हर पल बसंत बहार होगा।
रिमझिम मेघ बरसेगा अम्बर से,
मिट्टी की सोंधी खुशबू बयार होगी,
जब धरती पर खुशहाली होगी,
तब सुखी अपना संसार होगा।
जो बारूदी खेल आज
खेल रहा यह जहान है,
गगनभेदी मिसाइलों से
उठा रहा तूफ़ान है।
परिणाम से इसके अनभिज्ञ वह,
खुद को सोचता महान है,
धरती का सबसे बड़ा विनाशक
खुद आज बना इंसान है।
ओज़ोन परत में छिद्र हो रहा,
ग्लोबल वार्मिंग धरा को तपा रहा,
हर मौसम अब सर्प-दंश सा लगता,
हर साल नया कुछ दिखा रहा।
क्यों खेल रहे हो धरती से,
जिसने माँ बन सबको पाला है,
जाग जाओ, रोक लो खुद को,
वरना फिर प्रलय आने वाला है।
उठो, जागो धरती माँ के लाडलों,
फिर करना माँ का श्रृंगार है,
बहुत लिया है इस धरती से,
कुछ अर्पण करना ही संस्कार है।
आओ चमन में फिर फूल खिलाकर,
पवित्र विचारों का संचार करें,
फिर से गरिमामय करते हैं धरा को,
जिसकी यह हकदार है।
अस्तित्व संकट में जड़ मानव का,
हर संकेत यह बतला रहा,
खतरे के बादल मंडरा रहे हैं,
फिर भी न अफसोस जता रहा।
मत बन अचेत, मन में स्मरण कर,
क्यों दिन अपने घटा रहा,
कहीं पृथ्वी स्वयं शून्य में न समा जाए,
जागो, मैं तुमको जगा रहा।
जागो, मैं तुमको जगा रहा…