Sunday, December 12, 2021

"वतन में शरणागत"...


क्यों अपना ही घर हमें, छोड़कर भागना पड़ा
हुक्मरान थे नींद में, हमें जागना पड़ा

पुस्तैनी ज़मीं छोड़ी, सपनों का मकाँ गया
किलकारियों से गूँजता, आँगन न जाने कहाँ गया

क्या कसूर था हमारा, क्यों यूँ बेदख़ल किया
बेबस बेगुनाहों का, किस जुर्म में क़त्ल किया

रो रहीं बहू-बेटियाँ, बुज़ुर्ग सब हताश थे
न पनाह, न अपनत्व मिला, अपने भी निराश थे

कैसे बचाई जान हमने, रात के अँधेरों में
चीखती कराहें गूँजतीं, कश्मीर के गधेरों में

सत् सनातन के राही, शिव का करते ध्यान सदा
निःशस्त्रों का हनन हुआ, इस सत्य का सबको पता

फिर भी सभी ख़ामोश हैं, न हलचल किसी सदन में है
शरणागत-से भटक रहे, अब तक अपने वतन में हैं

हक़ हमें भी अपना चाहिए, ज़मीं अपनी कश्मीर में
बहुत सह लिए ज़ख्म हमने, बेवजह अपनी तक़दीर में

अब कोई तो निर्णय करो, फ़ैसले जो हक़ में हों
मुस्कान सिर्फ़ चेहरे पर नहीं, खुशियाँ हर रग-रग में हों

फिर से वही घर चाहिए, और वहीं बसेरा हो
अब नफ़रतों की शाम ढले, अमन का सवेरा हो

             


          


   


Monday, November 29, 2021

आखिर क्यूँ बँट रहे हैं लोग..


ज़र, ज़ोरू, ज़मीन की ख़ातिर बँट रहे हैं लोग,
जाति, धर्म, मज़हब के नाम पर कट रहे हैं लोग।
इंसानियत और अपनेपन को भूल बैठे इस क़दर,
धीरे-धीरे अपने ही घरों से घट रहे हैं लोग।

भाई-भाई के बीच अब दीवारें गढ़ रहे हैं लोग,
पड़ोसी का हाल पूछने से भी मुकर रहे हैं लोग।
मैं भी निकला हूँ तलाश में एक ऐसी बस्ती की,
जहाँ इंसान और इंसानियत की इज़्ज़त कर रहे हैं लोग।

मुँह में राम, बगल में छुरा लेकर चल रहे हैं लोग,
अपनों की कामयाबी देखकर भीतर जल रहे हैं लोग।
जिस कुएँ का पानी बरसों प्यास बुझाता रहा,
उसी कुएँ को प्यासा छोड़कर लौट निकल रहे हैं लोग।

अपनों की ख़बर नहीं, गैरों को मनाते हैं लोग,
राम का नाम लेकर कर्म रावण के निभाते हैं लोग।
जिनके आदर्शों से रोशन रही सदियों तक ये धरा,
धीरे-धीरे उन्हीं की साख मिटाते हैं लोग।

बाप की ज़मीन बेचकर महलों के ख़्वाब बुन रहे हैं लोग,
बीमार माँ को छोड़ पैसों का हिसाब गिन रहे हैं लोग।
रिश्तों की नींव कितनी खोखली हो चली है देखो,
अपनों से डरकर गैरों को पहरेदार चुन रहे हैं लोग।

युधिष्ठिर को भुलाकर दुर्योधन बन रहे हैं लोग,
नफ़रत और भ्रष्टाचार के दलदल में सन रहे हैं लोग।
धर्म अब जीवन का पथ नहीं, स्वार्थ का औज़ार बना,
अपने मतलब से शास्त्रों का अर्थ गढ़ रहे हैं लोग।

चेहरों पर मुस्कान, मगर दिलों में ज़हर लिए हैं लोग,
भीड़ में रहकर भी तन्हाई का सफ़र किए हैं लोग।
कभी इंसानियत की शान हुआ करती थी ये दुनिया,
आज इंसान की तलाश में भटक दर दर रहे हैं लोग।





Tuesday, November 16, 2021

हाँ मैं एक पुरुष हूँ...



हाँ, मैं एक पुरुष हूँ,
पुरुष होने पर मुझे गर्व भी है।
मगर स्त्री का विरोध करूँ,
मेरे संस्कारों में ऐसा कभी नहीं।

स्वाभिमान मेरी पहचान है,
अभिमान मेरा स्वभाव कभी नहीं।
अपने सम्मान की रक्षा करता हूँ,
पर नारी का अपमान सोचूँ—ऐसा कभी नहीं।

स्त्री और पुरुष प्रतिद्वंद्वी नहीं,
जीवन-रथ के दो पहिए हैं।
एक के बिना दूसरा अधूरा है,
दोनों मिलकर ही जीवन जीते हैं।

जहाँ सम्मान और समझदारी बसती है,
वहाँ शक पनपता कभी नहीं।
विश्वास की नींव यदि गहरी हो,
तो रिश्ता बिखरता कभी नहीं।

चलें अगर दोनों कंधे से कंधा मिलाकर,
तो हर मुश्किल आसान हो जाती है।
साथ हो विश्वास और समर्पण का,
तो हर मंज़िल मुस्कुराती है।

नर हो या नारी, दोनों ही
परमब्रह्म की अनुपम संतान हैं।
फिर ऊँच-नीच का भेद रच देना,
मानव का भ्रम है, ईश्वर का विधान नहीं।

अधिकारों की लड़ाई हो,
तो कर्तव्यों का साथ भी होना चाहिए।
सम्मान अगर दोनों को चाहिए,
तो सम्मान देना भी आना चाहिए।

हाँ, मैं एक पुरुष हूँ,
इस बात का मुझे अभिमान है।
मगर हर स्त्री का सम्मान करना ही
मेरे चरित्र की पहचान है।

मैं न किसी के अधिकारों का विरोधी हूँ,
न किसी की स्वतंत्रता से भयभीत।
मैं केवल इतना मानता हूँ—
स्त्री और पुरुष विरोधी नहीं, एक-दूसरे के पूरक हैं।