कहाँ त्रेता द्वापर के बंधन मे
बंधने वाली ये नारी है
कल युद्ध लड़ा था श्रीराम ने
अब सीता की बारी है
हर युग मे प्रभु नहीं आयेंगे
त्रिया स्वाभिमान बचाने को
बनो सुदृढ़ कर लो बाजुओं को सख्त
तैयार रहो हथियार उठाने को
तुमको ही करनी है फतह
लंका और कुरुक्षेत्र भी
मौन ही रहने दो बनकर धृतराष्ट्र समाज को
कितने जन्म लेंगे त्रि नेत्र भी
न कोई रावण न कोई दुशासन
टिक पाएगा तेरे प्रहार से
कब तक विनय करके मांगेगी
हक जड़ अधिकाय संसार से
हाथ बढ़े जो चीर हरण को
या सतित्व को ठेस पहुंचाने को
बन काली भर अग्नि हुंकार
रक्त रंजित नेत्र काफी है भू पटल हिलाने को
ओजपूर्ण सुन्दर सृजन ।
ReplyDeleteरंगोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
DeleteBahut sundar panktiyan...
ReplyDeleteआज के इस बेहतरीन अंक में मेरी रचना को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार 🙏
ReplyDeleteबहुत सुन्दर श्रृजन 👌👌
ReplyDeleteअंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं।
बहुत बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteहक जड़ अधिकाय संसार से
Deleteहाथ बढ़े जो चीर हरण को
या सतित्व को ठेस पहुंचाने को
बन काली भर अग्नि हुंकार
रक्त रंजित नेत्र काफी है भू पटल हिलाने को
बहुत सटीक एवं प्रेरक सृजनवाह!!!
ओजपूर्ण ,अभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteसादर।
सुन्दर
ReplyDeleteबहुत सुंदर सृजन । सादर ।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर विचार श्रंखला
ReplyDeleteसमय की यही पुकार है
ReplyDeleteसभी रचनाएं अद्वितीय हैं, मंत्रमुग्ध करती हैं असंख्य शुभकामनाएं मान्यवर ।
ReplyDeleteअनुपम
ReplyDeleteवाह!!!
ReplyDeleteबहुत सटीक... लाजवाब।
अच्छी कविता.
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteबहुत सुन्दर 🙏
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
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