Saturday, April 12, 2025

तुम वो महामहिम बनो....



तुम राम बनो, रहीम बनो,

इस देश के महामहिम बनो,

और तौल सको जो धर्म-अधर्म को,

तुम वो आधुनिक मशीन बनो...

सत्ता का तुमको गर्व न हो,

ना सिर्फ जीत की अभिलाषा हो,

तुमसे भय हो हर सशक्त को,

पर तुमसे हर गरीब को आशा हो।

तेरे बल से तू जग को जीते,

पर कर्मनिष्ठ हो युधिष्ठिर जैसा,

जब बात न्याय-धर्म की आए,

निर्णय में अपना-पराया कैसा।

जैसे भेद न करता सूर्य

राजा और रंक में,

जैसे शीतलता देना प्रकृति है

कोसों मील विचरते मयंक में।

तू भी अपना धर्म निभाना,

चाहे वजह ज़ोरू या ज़मीन हो,

तुम हो प्रधान सेवक जनमानस के,

चाहे ओहदे से महामहिम हो।

जय हिन्द।




12 comments:

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    1. बहुत बहुत आभार गुरुजी 🙏

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है ... अच्छे बंध हैं सभी ...

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    1. बहुत बहुत आभार महोदय 🙏

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  3. ये तो जैसे हर उस शख्स के लिए आईना है जो कुर्सी पर बैठते ही खुद को खुदा समझने लगता है। हर लाइन में एक उम्मीद है, एक सीख है। सूर्य और चंद्रमा जैसे प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से निष्पक्षता और शीतलता की बात करना बेहद सुंदर और प्रतीकात्मक है। यह रचना न सिर्फ एक संदेश देती है, बल्कि सत्ता में बैठे हर व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित भी करती है।

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