ज़िंदगी, तू अजीब सी किताब है,
कभी आँसू, कभी हँसी का सैलाब है।
कभी धूप में जलती उम्मीदों का सागर,
कभी छाँव में ठहरी कोई ख़्वाब-सा गुलाब है।
तेरे हर पन्ने पे कुछ लिखा सा लगता है,
कहीं अधूरा, कहीं मुकम्मल जहान टिका सा लगता है।
कभी ठोकरें देती है रास्तों पे चलने को,
कभी हाथ पकड़ कर सहारा देती है संभलने को।
कभी तू शिकवा बनकर छलकती है आँखों से,
कभी दुआ बनकर ठहर जाती है होंठों पे।
कभी खामोशियों में भी बोल उठती है,
कभी भीड़ में भी तन्हाई का एहसास दिलाती है।
ज़िंदगी, तू सिखाती है —
हार में भी जीत की एक लकीर होती है,
हर अँधेरे के पीछे सुबह की ताबीर होती है।
गिरना भी मंज़िल का ही एक हिस्सा है,
सफलता के पीछे इंसान की तक़दीर होती है।
कभी दर्द, कभी गीत,
कभी मुस्कान, कभी प्रीत —
ज़िंदगी तू ना जाने कैसी पहेली है,
किसी के लिए सख्त प्रशिक्षक, किसी के लिए सहेली है।

मार्मिक रचना
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteतेरे हर पन्ने पे कुछ लिखा सा लगता है,
ReplyDeleteकहीं अधूरा, कहीं मुकम्मल जहान टिका सा लगता है।
बेहतरीन सृजन ।
बहुत बहुत आभार
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
Deleteन्म से मृत्यु तक की यात्रा के
ReplyDeleteमध्य फैली अनदेखे पलों की कहानी है ज़िंदगी।
बहुत अच्छी रचना।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १७ अक्टूबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
शुक्रिया 🙏
Deleteबहुत खूब
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteज़िंदगी की उहापोह को परिभाषित करती सुंदर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
Deleteआपकी कविता पढ़कर लगा जैसे किसी ने ज़िंदगी की हर रंगत और एहसास को बड़े प्यार से शब्दों में पिरो दिया हो। मुझे अच्छा लगा कि आपने गिरने और संभलने, दर्द और खुशी, सबको सहज तरीके से दिखाया है। पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा कि ज़िंदगी सच में एक दोस्त की तरह भी है और सख्त गुरु की तरह भी।
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया
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