आख़िर तुम्हें क्या तकलीफ़ है, पथिक?
खामोश और तन्हा क्यों भटक रहे हो?
सूरज भी झील में डूब चुका है,
और कोई पक्षी अब चहचहाता नहीं।
कहो पथिक, किस दर्द ने
तुम्हें इतना मौन कर दिया?
झील भी आज असामान्य रूप से शांत है,
हवा तक कोई संदेश लाती नहीं।
तुम्हारे माथे की एक शिकन,
नम पलकों की ख़ामोशी के साथ,
तेरे सुर्ख़ गालों पर खिलता गुलाब
पल भर में मुरझा जाता है।
मेरे प्रश्न पर वह मुस्कुराया,
मगर मुस्कान आँखों तक पहुँच न सकी।
कुछ पल झील को निहारता रहा,
फिर धीमे स्वर में कहने लगा—
मैं स्वप्न में एक स्त्री से मिला,
जो हुस्न-ए-अप्सरा लिए हुए थी।
जिसके केश चरणों तक बिखरे थे,
और आँखों में अथाह समंदर समाया था।
मैंने उसे सोलह श्रृंगार से सजाया,
कंगन पहनाए, इत्र भी दिया।
उसने बस एक नज़र मुझे देखा—
मानो मेरी ख़ामोशियाँ पढ़ ली हों।
मैंने उसे पलकों पर बसा लिया,
फिर दिन भर कुछ और देखा नहीं।
पूर्णिमा के चाँद-सा उसका चेहरा
बादलों में जाने कहाँ खो गया।
अब भी मेरी आँखें
हर ओर उसी को खोजती हैं,
मानो भोर का कोई सपना
जो जागते ही बिखर गया हो।
उसके होंठों की ख़ामोशी में
मैंने एक अनकहा अंजाम देखा,
एक ऐसी चेतावनी
जिसे प्रेम ने सुनकर भी अनसुना कर दिया।
जब मेरी आँख खुली,
मैं एक ठंडी, सुनसान पहाड़ी पर था।
तभी से मैं यूँ ही भटक रहा हूँ—
अकेला, ख़ामोश और बेरुख़ी लिए।
मानो झील ने अपना प्रतिबिंब खो दिया हो,
और हवाओं ने अपनी धुन।
मैं आज भी उसी राह पर हूँ,
जहाँ वह स्वप्न मुझसे बिछड़ा था।
लोग कहते हैं—मैं रास्ता भटक गया हूँ।
काश... वे जानते,
मैं किसी रास्ते का नहीं,
एक अधूरे प्रेम का
पथिक हूँ।

