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Tuesday, April 21, 2026

फासलों के उस पार....



अब रोज़ तुझसे गुफ़्तगू कहाँ मयस्सर होती है,
मगर हर साँस में तेरी ही ख़बर होती है।
सच कहूँ, दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है,
रात की हर चुप्पी तेरे नाम बसर होती है।

ख़ुदा तुझे हर ग़म की हवा से बचाए रखे,
यहाँ अपनों की नज़र भी अक्सर ख़ंजर होती है।
मैं मुस्कुरा भी दूँ तो लोग वजह पूछते हैं,
किसे बताएँ कि दिल में कैसी हज़र होती है।
(हज़र = डर)

वो तेरी हँसी… जैसे सूखे लबों पर बारिश,
वो तेरी बात… जैसे रूह पर असर होती है।
तू महफ़िल में रहे तो रौशनी उतर आए,
तेरे बिन हर बस्ती भी वीरान शहर होती है।

तेरी ख़ामोशी भी अल्फ़ाज़ से भारी लगती,
कभी समंदर, कभी डूबती लहर होती है।
मीलों फ़ासलों में भी तू दिल से दूर नहीं,
कुछ मोहब्बतें जिस्म नहीं, रूह का सफ़र होती हैं।

वक़्त की धूल ने बहुत कुछ ढक लिया लेकिन,
तेरी याद अब भी दिल में चिराग़-ए-सहर होती है।
मैं हर दुआ में तेरा नाम यूँ रखता हूँ,
जैसे सजदे में कोई आख़िरी आस ठहर होती है।

अगर कभी तेरी आँखों में उदासी उतर आए,
समझना मेरी दुआओं में कहीं कसर होती है।
शिकवा तो नहीं इन फ़ासलों से अब मुझको,
बस तेरे ठीक होने की तलब उम्रभर होती है।

कभी जो थक के बैठ जाए तेरी मुस्कुराती रूह,
मेरी याद भी शायद तेरे पास हमसफ़र होती है।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे रहते हैं,
और कुछ अधूरे होकर भी ताउम्र असर होती है।

सच कहूँ, तेरे बाद भी ज़िंदगी चल तो रही है,
मगर हर धड़कन में एक ख़ाली सी लहर होती है।
तू मिले न मिले, ये मुक़द्दर की बात सही,
मोहब्बत तो वही है जो दुआ बनकर अमर होती है।



Sunday, October 5, 2025

इकरार के आगे.....

 



दुनिया में बहुत कुछ है प्यार के आगे
सिर्फ मौत ही हल नहीं इंकार के आगे

पलकों पे सजाए रखें हैं तस्वीर तेरी लोग
लेकिन धुँधला पड़ जाता है दीदार के आगे

तेरी महफ़िल में बैठे ही जाँ देकर उठे
हम बचे कैसे रहते तेरे असरार के आगे

ग़म की सौग़ात लिए घूमे हैं सहरा-सहरा
दिल नहीं टिकता किसी भी गुलज़ार के आगे

तेरी आँखों का जादू है कि जंजीर का बोझ
क़ैद हो जाता है इंसाँ भी पहरेदार के आगे

जिस्म चाहे थक गया हो सफ़र की मुश्किल से
रूह रुक नहीं सकती अब मझधार के आगे

शबनमी ख्वाब सजे हैं तेरी पलकों के तले
चाँद भी सर झुकाता है रुख़सार के आगे

ख़ौफ़-ए-तन्हाई से डरता नहीं "हैरी" अब तो
रब की रहमत ही काफ़ी है ग़मगार के आगे

अब "स्याही" भी खामोश नहीं रह सकती दोस्त,
लफ़्ज़ सिर झुका देते हैं इकरार के आगे।





Sunday, July 20, 2025

"मैं और तुम — एक अधूरी पूर्णता"...

मैं हूँ खुली किताब सा तेरे लिए 
तुम मेरे लिए एक पहेली हो
मै वीरान कोई मकान पुराना
तुम एक अलीशान हवेली हो

मैं बंजर जमीं का टुकड़ा सा 
तुम खेत खुले हरियाली हो
मै मुरझा एक टूटा पत्ता सा 
तुम कलियो की लाली हो

मैं बूंद बूंद बहता पानी
तुम सागर अपरम्पार हो 
मै धरा का एक हिस्सा मात्र 
तुम सारा ही संसार हो 

तुमसे ही हर रिश्ता है जग मे 
मैं उस रिश्ते की डोर हूं 
तुम शीतल चांद हो गगन की 
मैं तुमको तकता चकोर हूँ 

मैं भोर का हूँ एक डूबता तारा 
तुम प्रकाश दिनकर के हो 
मैं एक अभिशाप सा हूँ धरती पर 
तुम वरदान ईश्वर के हो

मैं सूनी राहों का एक मुसाफ़िर,
तुम मंज़िलों की कहानी हो।
मैं टूटी-बिखरी सी लकीर,
तुम किस्मत की निशानी हो।

मैं धूप की जलती छाया हूँ,
तुम सावन की रिमझिम बूँदें हो।
मैं अधूरी कोई आरज़ू,
तुम ख़्वाबों की सौगंधें हो।

मैं समय की धूल में खोया पल,
तुम कालचक्र की धुरी हो।
मैं एक अधूरा सा अध्याय,
तुम इक सदी पूरी हो।

मैं एक दबी चीख़ सा मौन,
तुम शंखनाद की वाणी हो।
मैं साधारण सी परछाईं,
तुम दिव्य ज्योति-कल्याणी हो।

मैं एक प्रश्न बनकर रह गया,
तुम हर उत्तर की धार हो।
मैं बस एक झलक भर हूँ,
तुम दृश्य सम्पूर्ण संसार हो।

Monday, September 27, 2021

पथिक..


आख़िर तुम्हें क्या तकलीफ़ है, पथिक?
खामोश और तन्हा क्यों भटक रहे हो?
सूरज भी झील में डूब चुका है,
और कोई पक्षी अब चहचहाता नहीं।

कहो पथिक, किस दर्द ने
तुम्हें इतना मौन कर दिया?
झील भी आज असामान्य रूप से शांत है,
हवा तक कोई संदेश लाती नहीं।

तुम्हारे माथे की एक शिकन,
नम पलकों की ख़ामोशी के साथ,
तेरे सुर्ख़ गालों पर खिलता गुलाब
पल भर में मुरझा जाता है।

मेरे प्रश्न पर वह मुस्कुराया,
मगर मुस्कान आँखों तक पहुँच न सकी।
कुछ पल झील को निहारता रहा,
फिर धीमे स्वर में कहने लगा—

मैं स्वप्न में एक स्त्री से मिला,
जो हुस्न-ए-अप्सरा लिए हुए थी।
जिसके केश चरणों तक बिखरे थे,
और आँखों में अथाह समंदर समाया था।

मैंने उसे सोलह श्रृंगार से सजाया,
कंगन पहनाए, इत्र भी दिया।
उसने बस एक नज़र मुझे देखा—
मानो मेरी ख़ामोशियाँ पढ़ ली हों।

मैंने उसे पलकों पर बसा लिया,
फिर दिन भर कुछ और देखा नहीं।
पूर्णिमा के चाँद-सा उसका चेहरा
बादलों में जाने कहाँ खो गया।

अब भी मेरी आँखें
हर ओर उसी को खोजती हैं,
मानो भोर का कोई सपना
जो जागते ही बिखर गया हो।

उसके होंठों की ख़ामोशी में
मैंने एक अनकहा अंजाम देखा,
एक ऐसी चेतावनी
जिसे प्रेम ने सुनकर भी अनसुना कर दिया।

जब मेरी आँख खुली,
मैं एक ठंडी, सुनसान पहाड़ी पर था।

तभी से मैं यूँ ही भटक रहा हूँ—
अकेला, ख़ामोश और बेरुख़ी लिए।
मानो झील ने अपना प्रतिबिंब खो दिया हो,
और हवाओं ने अपनी धुन।

मैं आज भी उसी राह पर हूँ,
जहाँ वह स्वप्न मुझसे बिछड़ा था।

लोग कहते हैं—मैं रास्ता भटक गया हूँ।

काश... वे जानते,
मैं किसी रास्ते का नहीं,
एक अधूरे प्रेम का
पथिक हूँ।