कैसे बेच देते हैं लोग चंद सिक्कों में ज़मीर को,
जहाँ फ़ायदा हो, वहीं झोंक देते हैं मोम-से शरीर को।
कल दिल्ली के आंदोलन के बच्चे दिख रहे थे सभी को,
आज झारखंड के बच्चे अकेले पार कर रहे शमशीर को।
जो 'दीप' बनकर रोशनी बाँटने का ढोंग रचाते रहे,
वो कैमरों की चमक में ही तलाशते हैं अपनी ताबीर को।
न मसनद के बाज़ीगर जागे, न विपक्ष के मौसमी रहनुमा,
सबने अपनी सहूलियत के तराज़ू में तोला है इस तस्वीर को।
जहाँ मंच मिला, जहाँ टीआरपी थी, वहाँ हमदर्दों का मेला था,
आज सन्नाटा साधे बैठे हैं, देखकर छात्रों की तक़दीर को।
इंसाफ़ भी अब चेहरे और भूगोल देखकर बाँटते हैं ये लोग,
कौन समझेगा इन बेबस और अनदेखे युवाओं की पीर को?
मगर याद रहे, जो अकेले रास्तों पर लड़ना जानते हैं,
वही कल बदलकर रख देंगे इतिहास की हर तहरीर को।
भूलेगा नहीं झारखंड का युवा दोगलेपन की इस तासीर को,
न्याय को मत बाँटो खण्डों में, खींचकर नफ़रत की लकीर को।
