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Wednesday, June 24, 2026

संबंधों की बंजर ज़मीन...

 


 कुछ ज़ख्म कभी भरते ही नहीं,

कुछ लोग माफ़ करते ही नहीं।

अब रोज़ तानों के बीच खड़ा हूँ,

तारीफ़ों के फूल होंठों से झरते ही नहीं।


अब बिखर गए हैं सारे रिश्ते,

पहले जैसे सँवरते ही नहीं।

जिनके पसीने से हाथ-पैर फूल जाते थे,

वो ख़ून देखकर भी अब डरते ही नहीं।


इतनी कटुता आ गई है संबंधों में,

अब अपराध करके भी बिखरते ही नहीं।

एक दौर में लोग आत्मग्लानि में डूब जाते थे,

अब घिनौने कर्मों में डूबकर भी मरते ही नहीं।


क्या दौर आया है, ख़ुद माली ही

बगिया को पानी से भरते ही नहीं।

अब राम-रहीम कभी एक राह से,

चाहकर भी गुज़रते ही नहीं।


जब सूख चुका हो पानी जड़ों का,

तब फल टहनियों पर ठहरते ही नहीं।

जिस औलाद ने देखा हो तिरस्कार बुज़ुर्गों का,

वो माँ-बाप की इज़्ज़त फिर करते ही नहीं।


जाओ कहीं भी, मत भूलो अपनों को,

वृद्धाश्रमों में घर बस्ते ही नहीं हैं।

जिन्होंने रुलाई हों बूढ़ी आँखों को कभी,

फिर वो जीवन भर कभी हँसते ही नहीं हैं।


दौलत से खरीद लोगे हर सुख ज़माने का,

माँ-बाप के साए बाज़ारों में मिलते ही नहीं हैं।

संबंधों की मिट्टी जब बंजर हो जाए,

फिर प्रेम के फूल चाहकर भी खिलते ही नहीं हैं।



Thursday, September 9, 2021

जंग या जिंदगी ?


हर युद्ध के बाद
किसी को तो राख समेटनी ही पड़ती है,
दीवारों से चिपकी चीखों को
धीरे-धीरे खुरचना ही पड़ता है।

किसी को तो हटाना ही होगा
मलबा सड़कों के किनारों तक,
तभी तो लाशों से भरी गाड़ियाँ
शहर के आर-पार जा सकेंगी।

किसी का पाँव तो धँसेगा ही
कीचड़, राख और खून में,
टूटी कुर्सियाँ, बिखरे खिलौने,
फटे हुए वस्त्र और बुझी आँखें—
सब गवाही देंगी
कि सभ्यता एक बार फिर हार गई।

किसी को तो रखनी होगी
नई दीवारों की बुनियाद,
और किसी को रोशनदान बनकर
घुटते कमरों में हवा उतारनी होगी।

यह आग अचानक नहीं भड़की,
बरसों से भीतर सुलग रही थी,
नफ़रत के सूखे पत्तों पर
स्वार्थ का तेल डाला गया था।

हथियार फिर चमकाए जा रहे हैं,
एक और युद्ध की तैयारी में,
जबकि इतिहास की राख में
अब भी अनगिनत चेतावनियाँ दबी हैं।

याद है वह दुबला-सा पथिक,
जिसकी हथेली में सत्य था,
और जिसके शांत कदमों ने
साम्राज्यों की नींद उड़ा दी थी।

अहिंसा के दो सरल अक्षरों ने
तलवारों की धार को चुनौती दी,
और बिना रक्त बहाए ही
सत्ता के सिंहासन हिला दिए थे।

आस्तीनों में आज भी
कई साँप पल रहे हैं,
भले कारतूसों पर जंग चढ़ी हो,
इरादे अब भी ज़िंदा हैं।

जाँबाज़ हौसले आज भी
अन्याय के विषदंत तोड़ सकते हैं,
और सच की एक छोटी लौ भी
अँधेरों का साम्राज्य मोड़ सकती है।

घास के बीच फिर उग आई हैं
रक्तरंजित कुछ कोंपलें,
किसी को तो थामना होगा हाथ
इन जर्जर, टूटते हौसलों का।

क्योंकि हर युद्ध के बाद
सिर्फ़ शहर नहीं उजड़ते,
घर की हँसी, बच्चों के सपने,
माँओं की आँखों का उजाला भी मरता है।

और किसी को तो फिर
राख में उम्मीद तलाशनी पड़ती है,
ताकि मनुष्य
एक बार फिर मनुष्य बन सके।