Sunday, December 17, 2023

हार कर फांसी पे चढ़ गया...

 


बेरोज़गार मेरे राज्य का, काँच-सा बिखर गया,

इम्तिहान देना चाहता था, घोटालों से डर गया।


नियुक्तियाँ सब खा गए, नेता के रिश्तेदार,

ज्यों पालक की बेड़ी को, खुला सांड चर गया।


विज्ञप्तियों के इंतज़ार में, चश्मे का नंबर बढ़ गया,

प्रतिस्पर्धा की दौड़ में, वो खुद से ही पिछड़ गया।


सोचा था पहाड़ रहकर, गाँव-घर सँवारेंगे,

पर उसका हर एक ख़्वाब, राजनीति में गड़ गया।


फिर भी हौसला समेटकर, हालातों से लड़ गया,

ना वक़्त साथ दे सका, अपनों से भी बिछड़ गया।


नाकामियाँ मजबूर कर, हार उसकी गढ़ रहीं,

ज्यों कच्चा फल डाल पर, पकने से पहले सड़ गया।


दीमक लगी प्रतिभा को, संतुलन भी बिगड़ गया,

फिर भी सफलता के लिए, किस्मत से वो अड़ गया।


आख़िर जला दीं डिग्रियाँ, सपनों की हर पोटली,

एक और बेरोज़गार फिर, फाँसी पे चढ़ गया।






Thursday, October 26, 2023

कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है..



कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है

अर्द्ध मूर्छित है मगर बेहोश नहीं है

जो चाहे जिस भाषा शैली में गड़े 

व्यंगात्मक हो सकती है मगर रूपोश नहीं है 


कोई तारीफ लिखे कोई नाकामियाँ 

कोई व्याकुलता कोई संतोष लिखे 

कोई अमन शांति का पैगाम दे  

कोई उबलते जज्बातों का आक्रोश लिखे 


कुछ लिखते हैं अनकहे जज्बातों को 

कुछ अपने व्यंग्य का सैलाब लिखे 

कुछ धरती के मनोरम सौंदर्य का करते वर्णन 

कुछ कटु वर्णो से तेजाब लिखे 


कुछ प्रेम का सुंदर आभास लिखते हैं 

कुछ दबे कुचले लोगों की आवाज लिखे 

कुछ लिखते हैं खामोशी आपातकाल की 

कुछ 1857 की क्रांति का आगाज लिखे 


हर कोई अपने तरीके से तोड़ मरोड़ कर 

नए रचनाओं से नए शब्दों को आयाम देते हैं 

कोई फैलाते है जहर दुनियाँ मे 

कोई हर ओर शांति का पैगाम देते हैं 


बहरे है लोग भले गूंगी सरकार चाहे 

जंग जारी है कवि खामोश नहीं है 

कितनी कर लो अवहेलना विरोध मे 

कविता स्पष्ट है बरदोश नहीं है ||

बरदोश = छुपी हुयी 

रूपोंश = भागा हुआ, 




Wednesday, October 11, 2023

कल तेरी भी बारी है...


                       करके खून पसीना एक

रिश्तों को जिसने सींचा है,

सहकर दुनियाभर की पीड़ा 

जिसने आंखों को मींचा है


तपती दुपहरी बिन चप्पल भी 

सातों भँवर वो घूम रहा है

चिंता मे व्याप्त रहता हरपल

ना एक पल का भी सुकून रहा है 


कौड़ी कौड़ी जोड़-जोड़कर 

जिनके ख्वाबों का आगाज़ किया है 

उसकी फटी एड़ियों का दर्द

उन सबने नजरअंदाज किया है


उसके फटे-पुराने कपड़े

उसकी मजबूरी दर्शाते हैं

जिसने बांँटा कौर भी खुद का 

लो अब उसी के लिए तरसाते हैं 


कितना खुदगर्ज हो रहा है इंसां

भुला बैठा जीवनदाता का उपकार 

बूढ़े माँ बाबा को समझे बोझ

बढ़कर पिल्लों को देता है प्यार 


आरंभ हो चुका है कलयुग, तम

धीरे-धीरे पैर पसार रहा है

पहले जड़ें जर्जर हुई नातों की

अब इंसानियत भी मार रहा है


कोई देश , कोई धर्म विरोधी

कहीं विरोध भाई–भाई का कर रहा है

समझ रहे हैं हम जहां की उन्नति

पर मेरी नजर में सब उजड़ रहा है।


क्या मोल है उस प्रगति का

जिसमें निज कुटुंब का भाव नहीं 

निष्ठुर वृक्ष वह है खजूर सम,

अपनत्व की शीतल छाँव नहीं 


दुःखी पड़ा है मनुज मुस्काता

तिस पर अंतर्मन में सुकून नहीं 

विरक्त हो चुकी रक्त वाहनियाँ 

अब किसी में पितृ सेवा का जुनून नहीं 


भूल चुका चरणों मे इनके

खुदा ने जन्नत न्यौछारी है

आज जैसा वह कर रहा है 

कल उसकी भी बारी है।।